झारखंड के भुरकुंडा वाले खेपा बाबा से लेकर विष्णुगढ़ की शांति देवी तक, झारखंड में नरबलि की खौफनाक कहानी

khepa baba

Time पत्रिका के जुलाई 2002 के अंक में खबर प्रकाशित हुई ।  15 साल की मंजू कुमारी की उसके पिता खुदु कर्मकार और उसकी मां ने मिलकर नरबलि दे दी ।  करीब 24 साल बाद बीजेपी के एक सांसद रामनवमी के मौके पर लिखते हैं धर्मो रक्षति, रक्षत: । उनके ऐसा लिखने से एक दिन पहले हजारीबाग में एक 13 साल की बच्ची की नरबलि दे दी गई । पुलिस, मीडिया और राजनीतिक दल इस नरबलि कांड में अपनी-अपनी हिस्सेदारी के हिसाब से बयानबाजी कर रहे हैं। मगर बच्चियों के खिलाफ सैकड़ों सालों से चली आ रही नरबलि की इस प्रथा को रोकने के लिए ना तो कोई महामानव आ रहा है और ना ही कोई अवतारी पुरुष । 

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‘देवी काली’ को कुवांरी बच्चियों की बलि क्यों चाहिए इस पर कोई चर्चा नहीं करता । बहरहाल Time पत्रिका में छपी मंजू की कहानी  इसलिए सुनना जरुरी है क्योंकि ढाई दशक के बाद एआई के जमाने में भी हिन्दुओं में चली आ रही है शर्मनाक प्रथा ना तो खत्म हो रही है ना ही इसके प्रति जागरुकता फैलानी की कोशिशें होती दिख रही हैं । पत्रिका लिखता है- “भारत में मानव बलि हमेशा से एक रही है। यहां तक कि 200 वर्ष पहले भी, जब कलकत्ता के एक काली मंदिर में प्रतिदिन एक लड़के की हत्या की जाती थी, तब भी इस तरह के रक्त-आधारित अनुष्ठान उस सौम्य हिंदू आध्यात्मिक परंपरा के विपरीत थे, जो संयम और शाकाहार को महत्व देती है। लेकिन काली अलग हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं में उन्हें बुराई का संहार करने वाली उग्र देवी के रूप में दर्शाया गया है, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्हें रक्त की अतृप्त प्यास है। आज के समय में, जब मानव हत्या पर कानून पहले से कहीं अधिक सख्ती से लागू होते हैं, तो मानव बलि के स्थान पर प्रतीकात्मक विकल्प अपनाए जाने लगे हैं। अधिकांश काली मंदिरों में अब बड़े कद्दू को मानव शरीर के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। वहीं कुछ अनुयायी आटे से बनी लगभग दो मीटर ऊंची मानव आकृतियों या फिर बकरों जैसे जानवरों की बलि देकर इस परंपरा का पालन करते हैं।”

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लोकसभा में दिवंगत रामविलास पासवान ने 18 दिसंबर 2003 में नरबलि का मुद्दा उठाते हुए कहा कि “धर्म के नाम पर इतने कुकर्म किए जा रहे हैं कि सीसीएल में काम करने वाले विजय पासवान के 6 साल के बेटे मुन्ना पासवान को अगवा कर लिया गया और बलि चढ़ा दी गई । भरकुंडा के खेपा बाबा के कहने पर नरबलि दी गई । “  मौजूदा पीढ़ी को भले ही खेपा बाबा के कांड की याद नहीं हो लेकिन  इस बाबा के बहुत सारे राजनीतिक भक्त उस वक्त भी थे और उम्र कैद काटने के बाद रिहाई के बाद भी भक्तों में कमी नहीं आई ।

खेपा बाबा ने सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा कर आश्रम खोला था, आज भी मंदिर आश्रम मौजूद हैं । भक्तों की संख्या कम नहीं हुई है शायद । झारखंड के हजारीबाग में 24 मार्च अष्टमी की रात 13 साल की बच्ची की हत्या के पीछे जो भी राजनीतिक रंग दिया जा रहा हो लेकिन नरबलि से इनकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि भगतिनी यानी तंत्र-मंत्र करने वाली एक महिला भी गिरफ्तार हुई है । इस मामले में बेटे को कमजोर या फिर बेटी की तरह बुद्धिमान नहीं देख शायद भगतिनी के कहे पर भरोसा हो गया और बलि देने के लिए तैयार हो गई । जरा सोचिए  कितना निर्मम और हैवानित भरा दृश्य रहा होगा । झारखंड के कई जिलों खासतौर से हजारीबा, रामगढ़-बोकारो,चतरा, धनबाद और गिरिडीह में ओझा-गुणी, तंत्र-मंत्र करने वालों का आतंक है । लगभग हर जिले में एक ‘प्रसिद्ध’ बाबा मिल जाएगा जो खासतौर से निचले तबके जिनमें दलित आते हैं को निशाना बनाते हैं । एक बार तो तांत्रिक के चक्कर में पड़ गया उसकी जिंदगी बर्बाद मानी जाती है। कई घरों मे बुरी आत्माओं का साया बता घरों को बांधा जाता है ।

 घर में और परेशानी बढ़ी तो मासूम बच्चों खासतौर से बच्चियों पर ‘माता’ ‘प्रेत’ आदि आने का बहाना नरबलि के लिए उकसाया जाता है । परिवार जितना गरीब होगा नरबलि की आशंका उतनी ही ज्यादा होगी। हजारीबाग के विष्णुगढ़ का मामला ही ले ले तो भगतिनी ने 250 रुपए मांगे और रेशमी देवी 20 रुपए ही दे सकी । धार्मिक अंधविश्वास ने दुनिया के सबसे पवित्र रिश्ते को भी नेस्तानाबूत कर दिया ।  हाल के वर्षों में डायन-बिसाही बता कर महिलाओं के खिलाफ हिंसा बढ़ी है ।ग्रामीण इलाकों में अचानक से बच्चों के गायब होने की खबरें भी नरबलि की आशंका की ओर इशारा है । दरअसल जहां भी लड़कियां आगे बढ़ती हुई दिखती हैं तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा बढ़ जाती है ।  सीएनएन की रिपोर्ट में समाजशास्त्री आशीष नंदी कहते हैं:
“आप देखते हैं कि आपका पड़ोसी अपनी जाति और हैसियत से ऊपर उठकर अच्छा कर रहा है, और कोई आपको कहता है कि एक बच्चा लेकर गुप्त अनुष्ठान करो, तो आप भी उसकी बराबरी कर सकते हैं। रहस्यवाद विशेषज्ञ इप्सिता रॉय चक्रवर्ती जोड़ती हैं: “इसका असली रहस्यवाद या आध्यात्मिकता से कोई लेना-देना नहीं है। यह पूरी तरह से सीधी-सादी लालच की बात है।”

खासतौर पर तारापीठ आज नए होटलों, रेस्टोरेंट्स और प्लास्टिक की तलवारें व काली के कटे पैरों की तस्वीरें बेचने वाली दुकानों से भरा एक बड़ा निर्माण स्थल बन चुका है। यहां आने वाले लोगों को देखकर लगता है कि काली अमीर और गरीब दोनों को आकर्षित करती हैं—चार सितारा होटलों के बाहर खड़ी एसयूवी गाड़ियाँ व्यापारियों और नेताओं की मौजूदगी दिखाती हैं, जो अपने बकरों के साथ गरीब तीर्थयात्रियों की कतार में खड़े नजर आते हैं।

(“तारापीठ में खून कभी सूखता नहीं,” एक ग्रामीण धीमी आवाज़ में कहता है।)  इस तरह की घटनाओं के पीछे पिृतसत्तात्मक समाज, महिलाओं का संपत्ति में अधिकारी और अंधविश्वास बड़ी बजह है।

 

विवेक सिन्हा

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