पटनाः बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद सोमवार को बिहार विधानपरिषद से इस्तीफा दे दिया है। वहीं बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी विधायक पद से इस्तीफा दे सकते है।हालांकि विधानपरिषद सदस्य के रूप में इस्तीफा देने के बाद भी नीतीश कुमार अभी मुख्यमंत्री बने रहेंगे। नीतीश कुमार ने अपना इस्तीफा जेडीयू एमएलसी संजय गांधी के माध्यम से पहुंचाया।1985 से शुरू हुए नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर में राज्यसभा जाना एक नया अध्याय जोड़ रहा है। लंबे समय तक विधान परिषद पर निर्भर रहने के बाद अब वे ऊपरी सदन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। 10 अप्रैल को राज्यसभा की सदस्यता लेने के साथ ही उनके राजनीतिक जीवन का यह नया चरण शुरू होगा।
नीतीश कुमार ने MLC पद से दिया इस्तीफा
इस्तीफा लेकर संजय गांधी पहुंचे विधान परिषद#Bihar #Nitishkumar pic.twitter.com/1zm0sqyvox— Live Dainik (@Live_Dainik) March 30, 2026
नीतीश कुमार के इस्तीफे को लेकर सोमवार सुबह से ही गहमागहमी बनी हुई थी। पहले जेडीयू की ओर से कहा गया था कि इस्तीफा उनके पास है, बाद में जेडीयू नेता इस्तीफे की कांपी लेकर विधानपरिषद सभापति के पास पहुंचे। नीतीश कुमार आगे आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री पद से भी इस्तीफा देंगे। हालांकि नियम के तहत वह अभी छह महीने सीएम रह सकते हैं।वहीं बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी बांकीपुर विधानसभा सीट से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए लिखा कि आज, मैं बिहार विधानसभा में बांकीपुर निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले निर्वाचित सदस्य के पद से इस्तीफा दे रहा हूं। पार्टी द्वारा मुझे सौंपी गई नई भूमिका के माध्यम से, मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र और बिहार राज्य के विकास के लिए सदैव तत्पर और प्रतिबद्ध रहूंगा…”
BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने ट्वीट किया, “…आज, मैं बिहार विधानसभा में बांकीपुर निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले निर्वाचित सदस्य के पद से इस्तीफा दे रहा हूं। pic.twitter.com/rHc16oq0dT
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रविवार को नितिन नबीन विधायक पद से इस्तीफा देने वाले थे लेकिन वो असम में चुनाव प्रचार करने चले गये। नितिन नबीन का इस्तीफा लगातार दूसरे दिन टल गया। नितिन नबीन के इस्तीफे को लेकर विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार सुबह 7 बजे ही विधानसभा पहुंच गये लेकिन बांकीपुर सीट से विधायक का पद छोड़ने वाले नितिन नबीन नहीं आए। नीतीश कुमार के भी इस्तीफा देने की चर्चा थी लेकिन रविवार को उनके आवास पर करीबियों के साथ मंथन हुआ। मुख्यमंत्री आवास पर हुई बैठक को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थी।
विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार दिल्ली में थे। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने इमरजेंसी कॉल पर उनको दिल्ली से पटना बुला लिया। प्रेम कुमार को दिल्ली में स्वागत समारोह कार्यक्रम में हिस्सा लेना था लेकिन बुलावे पर वह अपने तयशुदा कार्यक्रम को छोड़कर पटना आ गए। रविवार सुबह विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार हरकत में दिखे और इस्तीफा स्वीकार करने के लिए सदन के अंदर आ गए। बिहार विधानसभा के अध्यक्ष प्रेम कुमार ने कहा कि रविवार को हमारा दिल्ली में कार्यक्रम था और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने मुझे फोन कर पटना बुलाया। मैंने अपना कार्यक्रम स्थगित करते हुए पटना आने का निर्णय लिया।रविवार को सुबह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के विधानसभा पहुंचने की सूचना थी लेकिन किसी कारणवश वो विधानसभा नहीं पहुंच पाए।
बिहार विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने कहा, “मैंने CM से शिष्टाचार भेंट की है।उन्होंने अपना इस्तीफा दिया है, अब उसकी प्रक्रिया हो रही है। सीट खाली घोषित की जाएगी…उनके जाने से बिहार दुखी है…आज बिहार की गिनती विकसित राज्यों में हो रही है…इस्तीफा स्वीकार हो गया है।” pic.twitter.com/9hWIWQzYVP
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।संविधान और जनप्रतिनिधित्व कानून के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति एक साथ संसद राज्यसभा/लोकसभा) और राज्य विधानसभा का सदस्य नहीं रह सकता। हालांकि, चुनाव जीतने के बाद तत्काल इस्तीफा देना जरूरी नहीं होता।राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद नेता को निर्वाचन की अधिसूचना (Notification) जारी होने से लेकर लगभग 14 दिन के भीतर किसी एक पद का चयन करना होता है।अगर वह समय पर इस्तीफा नहीं देते, तो उनकी एक सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है।
लगातार चौथी बार विधान परिषद सदस्य थे नीतीश: नीतीश कुमार पहली बार 2006 में विधान परिषद के सदस्य बने थे। उसके बाद 2012, 2018 और 2024 में लगातार चौथी बार उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता ली थी।विधान परिषद की सदस्यता छह वर्ष के लिए होती है। उनके टर्म इस प्रकार रहे- 2006-2012, 2012-2018, 2018-2024 और 2024 से अब तक। आज इस्तीफा देकर उन्होंने इस लंबे सफर को समाप्त कर दिया है।नवंबर 2005 में पहली बार बिहार की सत्ता संभालने के बाद नीतीश कुमार ने हमेशा विधान परिषद के रास्ते मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।उन्होंने कभी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। 1985 में हरनौत से विधायक चुने जाने के बाद वे लोकसभा सदस्य भी रहे और केंद्र में मंत्री पद भी संभाला। लेकिन बिहार में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने विधानसभा की बजाय विधान परिषद की सदस्यता को प्राथमिकता दी।


