नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र कुमार की पुस्तक “नीले आकाश का सच” का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम में राम बहादुर राय, प्रो. के.जी. सुरेश, एडवोकेट विराग गुप्ता और पूर्व न्यायमूर्ति चंद्रमौली कुमार प्रसाद उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि राम बहादुर राय ने कहा कि यह पुस्तक पत्रकारों के लिए मील का पत्थर साबित होगी और इसे भारत सरकार को सम्मानित करना चाहिए। प्रो. सुरेश ने सुझाव दिया कि यह किताब सभी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होनी चाहिए, जबकि विराग गुप्ता ने इसे पत्रकारिता का दस्तावेज बताया।
“नीले आकाश का सच” बिहार और झारखंड की राजनीति, सत्ता, और प्रशासनिक तंत्र की परतें खोलती है। इसमें लालू प्रसाद के प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा, चारा घोटाले के रहस्य, झारखंड गठन की साजिशें और सत्ता परिवर्तन के खेलों का खुलासा किया गया है।
पुस्तक में बताया गया है कि कैसे कड़िया मुंडा की जगह बाबूलाल मरांडी को झारखंड का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया, झारखंड पुलिस के गुप्त सेवा कोष का दुरुपयोग कैसे हुआ, और राज्यपाल व केंद्र सरकार के बीच गोपनीय पत्राचार में क्या चल रहा था।
1912 से 2002 तक के राजनीतिक घटनाक्रमों को समेटती यह पुस्तक बताती है कि कैसे सत्ता, भ्रष्टाचार और राजनीति के गठजोड़ ने बिहार और झारखंड की दिशा तय की।
किताब की शुरुआत “बिहार विभाजन और झारखंड गठन” से होती है, जिसमें झारखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि, संघर्ष और अंततः राज्य निर्माण की राजनीतिक खींचतान को विस्तार से बताया गया है। यह अध्याय दिखाता है कि कैसे राजनीतिक समीकरणों के चलते वरिष्ठ नेता कड़िया मुंडा मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचते-पहुँचते रह गए और बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बन गए।
दूसरा अध्याय “पशुपालन घोटाला और लालू प्रसाद” बिहार की राजनीति के सबसे बड़े भ्रष्टाचार की कहानी कहता है। इसमें बताया गया है कि किस तरह करोड़ों रुपये सरकारी खजाने से फर्जी बिलों और घोटालों के जरिये निकाले गए और किस तरह इस घोटाला से बिहार की राजनीति का चेहरा बदल गया।
तीसरा अध्याय “लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के रोचक किस्से” बिहार की सत्ता के दिलचस्प और कभी-कभी हास्यपूर्ण पहलुओं को सामने लाता है। इसमें सत्ता के भीतर के कई ऐसे किस्से हैं जो राजनीति के मानवीय और नाटकीय दोनों रूपों को दिखाते हैं।
चौथा अध्याय “सचिवालय का सच और रिपोर्टिंग की यात्रा” लेखक की पत्रकारिक दृष्टि का परिचायक है। यह अध्याय सरकारी फाइलों, प्रशासनिक गड़बड़ियों और जमीनी रिपोर्टिंग के अनुभवों से भरा है।
पांचवां अध्याय में “बिहार के घोटालों से नहीं सीख लिया झारखंड ने “में बताया गया है कि कैसे झारखंड ने बिहार की गलतियों को दोहराया। नए राज्य में भ्रष्टाचार, गुप्त फंड के दुरुपयोग और सत्ता की राजनीति ने जनता की उम्मीदों को धूमिल कर दिया। “गुप्त फंड का गुप्त उपयोग”, “खान और उद्योग”, और “शराब पर खेल” जैसे अध्याय सत्ता और व्यवसाय के गठजोड़ को उजागर करते हैं। ये दिखाते हैं कि किस तरह प्राकृतिक संसाधनों और योजनाओं को निजी हितों के लिए इस्तेमाल किया गया।
“पानी के पाइप में बह रहा भ्रष्टाचार” अध्याय में जलापूर्ति योजनाओं में हुए घोटालों का खुलासा किया गया है, जबकि “रघुवर दास, मैनहर्ट और राज्यपाल का संयोग” सत्ता के ऊपरी स्तर पर चल रही अदृश्य राजनीतिक ताकतों का चित्रण करता है। अंतिम 11 वां अध्याय “द गार्डियंस बाबूलाल से हेमंत तक” झारखंड की राजनीतिक यात्रा को समेटता है। इसमें राज्य के मुख्यमंत्रियों की भूमिका, उनके फैसले, और विकास बनाम राजनीति की जंग का सटीक विश्लेषण है।



