आतिशबाजी की कहानी (Sory of Crackers) उतनी ही दिलचस्प है जितनी की इसकी आवाज और रोशनी । भले ही आज हम चीनी समानों का विरोध के शिगूफे में जी रहे हों मगर हकीकत तो ये है कि पहली बार पटाखों का इस्तेमाल चीनियों ने ही किया और दुनिया को इस मुल्क ने पढ़या आतिशबाजी का पहला पाठ।
- आसमान में सितारों की बारिश
- भारत में आतिशबाजी की परंपरा
- चीन ने दुनिया को दिया पटाखा
- … जब मार्कोपोलो की आँखें गईं चौंधिया
- बौद्ध भिक्षु करते थे पटाखे का इस्तेमाल
- इस तरह इटली में पहुंचा चीनी पटाखा
- यूरोप में लोकप्रिय होने लगी आतिशबाजी
- रिजेरी ब्रदर्स ने बनाया लोकप्रिय
- भारत कैसे पहुंचे पटाखे
- विजयनगर साम्राज्य की शानदार आतिशबाजी
- शिवकाशी कैसे बना पटाखों का शहर
- शिवकाशी में 300 दिन बनते हैं पटाखे
- पटाखों के लिए देश में बना 1940 में कानून
आसमान में सितारों की बारिश
आकाश में उड़ता रोशनी एक गुच्छा और फिर अचानक सितारों की बारिश। कुछ पलों के लिए रोशनी में नहा उठता है आसमान, बेहद की खूबसूरत नजारा। आंखों को सुकून देने वाला एक ऐसा दृश्य जिसे शब्दों में बयां करना बेहद ही मुश्किल है। धरती से ऊपर उठता हुआ आग का छोटा सा बुलबुला जब आसमान में फूटता है तो देखने वालों की आंखों को जो तृप्ति मिलती है उसे बयां करना नामुमिकन जैसा है ।आसमान में सितारों की बारिश, काले आसमान में रंगीन रोशनी, चंद सेंकेड्स के लिए मानों आसमानी दुनिया हो जाती है सबसे खूबसूरत आतिशबाजी यानि जीत और खुशियों का जश्न.. एक रिवाज जो इंसानी जूनून को एक नमूना बन चुका है।

भारत में आतिशबाजी की परंपरा
आतिशबाजी यानि खुशियों का एक ऐसा प्रतीक जिसका इस्तेमाल धर्मों,सीमाओं के बंधन में कभी नहीं बंधा। भारत में भी दिवाली के दौरान आतिशबाजी की पुरानी परंपरा है। सालों से दीयों के इस त्योहार पर पटाखे, अनार, लड़ियां जलाते आ रहे हैं। हांलाकि अब पटाखों को लेकर विवाद भी खड़ा होता जा रहा है। बहरहाल आतिशबाजी की शुरुआत हुई कैसे हुई। कहां से आई रंगीन रोशनी की इसकी कहानी हम आपको बता रहे हैं ।

चीन ने दुनिया को दिया पटाखा
आतिशबाजी का इतिहास बड़ा रोचक है। बहुत कम ही लोग जानते हैं कि पटाखों का आविष्कार चीन में हुआ था । चीनी लोगों ने पहली बार पटाखों का इस्तेमाल करना सीखा। बताया जाता है कि चीन में मसालेदार और लजीज़ खाना बनाते समय किसी रसोइए ने गलती से साल्टपीटर यानि पोटेशियम नाइट्रेट आग पर डाल दिया था जिसकी वजह से आग से उठने वाली लपटें रंगीन हो गईं। इस रसोइए के मुखिया ने तो साल्टपीटर के साथ ही कोयले और सल्फर का मिश्रण कर उसे आग के हवाले कर दिया था जिससे यह काफी तेज आवाज के साथ जला। बस,यहीं से आतिशबाजी यानी पटाखों की हुई शुरुआत।

… जब मार्कोपोलो की आँखें गईं चौंधिया
चीन ने पहली बार आतिशबाजी की तो मार्कोपोलो की आंखें चौंधिया गई। मार्कोपोलो इटली से चीन आए हुए थे। जब लौटे तो अपने साथ गन पाउडर बनाने की विधि ले गए। फिर शुरु हुआ आतिशबाजी पर प्रयोग बनने लगे तरह-तरह के पटाखे, सातवीं शताब्दी में चीन के तांग वंश के शासन के दौरान शुरु हुई। आतिशबाजी की कहानी सिर्फ रसोइये से ही नहीं जुड़ी है।
बौद्ध भिक्षु करते थे पटाखे का इस्तेमाल
माना जाता है कि आतिशबाजी से बुरी आत्माएं दूर भागती हैं और खुशियां और अच्छी किस्मत लेकर आती हैं। कहा जाता है कि बौद्ध भिक्षु ने गन पाउडर की खोज की। माना ये भी जाता है कि गन पाउडर और उससे निकलने वाली आग को बौद्ध अपने अंदर छिपी हुई बुराइयों को भगाने का साधन मानते थे। सातवीं सदी के तांग वंश के शासन से आगे बढ़ते हुए दसवीं सदी में चीन में आतिशबाजी का बाजारीकरण हो गया। अब लोग बाजारों में पटाखे खरीदने लगे थे। इस दौरान गन पाउडर या बारुद से रॉकेट बनाना भी चीनियों ने बखूबी सीख लिया, वक्त और आगे बढ़ा तो अरब के देशों के कारोबारियों ने जिनका सिल्क रुट से चीन से सीधा संपर्क था पटाखे बनाने की तकनीक सीख ली। सीरिया के लेखक ने अपनी किताब में रॉकेट, फुलझड़ियों का जिक्र किया है। अरबी लोग इसे चाइनीज फ्लावर के नाम से पुकारते थे ।
इस तरह इटली में पहुंचा चीनी पटाखा
हांलाकि अभी भी आतिशबाजी का क्रेज पूरी दुनिया में इस कदर नहीं छाया था जैसा कि आज के जमाने में है। आसमानी सितारों की इस बारिश की असली शुरुआत हुई मार्कोपोलो जब चीन से वापस लौटे तो आतिशबाजी का फॉर्मूला भी अपने साथ लेते गए। तेरहवीं सदी के आखिर में जब मार्कोपोलो की चीन से वापसी हुई तो वेनिस के तट पर आतिशबाजी की शुरुआत हुई। आज भी वेनिस के लोगों को आतिशबाजी बेहद पसंद है । 13वीं सदी में पोलैंड-जर्मनी की संयुक्त सेना और मंगोलियन सेना के बीच भयानक युद्ध हुआ इसमें मंगोलों ने गन पाउडर का इस्तेमाल कर पूरे यूरोप को खौफजदा कर दिया ।
यूरोप में लोकप्रिय होने लगी आतिशबाजी
यूरोप के इतिहास में आतिशबाजी 1779 में दर्ज की गई । विसेंजा में पहली बार फायरवर्क्स हुआ। इसके बाद आतिशबाजी के लिए तमाम रसायनिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल होने लगा। 15वीं सदी तक इटली में हर तरह पटाखे बनने लगे। अंधकार पर जीत का सबसे बड़ा पैमाना प्रकाश होता और आतिशबाजी इस प्रकाश का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका था। उस जमाने से लेकर आज तक खुशी और विजय का प्रतीक है आतिशबाजी। माना जाता है कि यूरोप में आतिशबाजी एक कला के तौर पर शुरु हुई.. उस दौर में 50 से 60 लोग ही होते थे जिन्हें आतिशबाजी आती थी और पूरे यूरोप में घूम घूम कर आतिशबाजी करते थे।
रिजेरी ब्रदर्स ने बनाया लोकप्रिय
आतिशबाजी के विशेषज्ञों में सबसे बड़ा नाम था रिजेरी ब्रदर्स को कहा जाता है कि रिजेरी ब्रदर्स को फ्रांस के राजा लुई 15वें ने 1740 में बलोनिया से वर्साइल बुला लिया। लुई 15वें ने अपने पोते की शादी एंतोएनेत से कराई और शादी के दौरान रिजेरी ब्रदर्स ने उस जमाने की सबसे शानदार आतिशबाजी दिखाई। 1770 में रिजेरी ब्रदर्स ने 20 हजार रॉकेट और 6 हजार मोटरों का इस्तेमाल कर विशाल आतिशबाजी की। इस आतिशबाजी का दायरा 3 सौ वर्गमीटर था। आज भी इटली की आतिशबाजी दुनिया में सबसे शानदार मानी जाती है। यहां कई ऐसे परिवार है जो पिछले 4 सौ साल से आतिशबाजी बनाने का कारोबार कर रहे हैं।
भारत कैसे पहुंचे पटाखे
अब सवाल ये कि भारत में कब शुरु हुई आतिशबाजी। कब आए पटाखे। इसकी कहानी भी चीन से जुड़ी है। मुगलों से लेकर विजयनगर साम्राज्य तक पटाखे के इस्तेमाल की कहानी बयां होती है। दीयों के त्योहार क्यों शुरु हुआ ये किसी को बताने की जरुरत नहीं क्योंकि हिन्दुस्तान में दिवाली की परंपरा राम राज के दौरान से रही है । हम बात कर रहे हैं आतिशबाजी और इसके इतिहास की। चीन और यूरोप से होता हुआ भारत कब आ पहुंचा पटाखा ये इतिहास बड़ा दिलचस्प है। माना जाता है कि 14वीं सदी में भारत में गन पाउडर का इस्तेमाल शुरु हुआ। युद्ध में गन पाउडर की बातें इतिहास में दर्ज है। मगर आतिशबाजी हिन्दुस्तान में पहुंचा चीनी और अरबी लोगों के जरिए ।
विजयनगर साम्राज्य की शानदार आतिशबाजी
विजयनगर में साम्राज्य के देवराया-2 के शासन काल में पारसी राजदूत अब्दुर रज्जाक ने लिखा है कि देवराया के महल में महानवमी का उत्सव मनाया जाता था ओड़िशा के शाही लेखक प्रताप रुद्रदेव ने अपन किताब कौतुक चिंतामणि में आतिशबाजी का जिक्र किया है 15वीं सदी में लिखी इस किताब से भारत में आतिशबाजी के सबूत मिलते हैं । आदिल शाह ने 1609 में एक शादी के दौरान 80 हजार रुपए सिर्फ आतिशबाजी के लिए दिए। 1518 में गुजरात आए पुर्तगाली लेखक ने भी ब्राह्मणों की शादी में पटाखों का जिक्र किया है ।गुजरात में उस दौर में बड़े पैमाने पर पटाखे इस्तेमाल किए जाते थे। दक्षिण में विजयनगर और उत्तर में सल्तनत काल से मुगल काल तक पटाखों का जिक्र मिलता है। आज के राजस्थान के कोटा में उस जमाने में 4 दिनों तक दिवाली मनाई जाती थी और इसमें में जमकर आतिशबाजी होती थी
शिवकाशी कैसे बना पटाखों का शहर
पटाखों की बात हो और शिवकाशी का जिक्र ना हो ये नामुमकिन है। जी हां तमिलनाडु के इस छोटे से शहर को पटाखों का पर्याय माना जाता है । सवाल ये कि आखिर यहां पटाखों की फैक्टरियां क्यों हुई शुरु हुई और किसने लगाई पहली फैक्टरी। चीन, अरब, इटली यूरोप, अमेरिका सहित पूरी दुनिया में आतिशबाजी का विकल्प आज तक नहीं मिला। प्रदूषण फैले या जान माल का नुकसान हो सदियों से चली आ रही इस परंपरा पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। पटाखों का नाम आते ही हम खरीदने से पहले सबसे पहले चेक करते हैं कि ये कहां बना है। अगर शिवकाशी का बना है तो कीमत भी अच्छी मिलेगी और भरोसा भी बढ़ेगा। जी हां शिवकाशी दक्षिण भारत का एक ऐसा शहर जो आज पटाखों का पर्याय बन चुका है।
शिवकाशी में 300 दिन बनते हैं पटाखे
शिवकाशी को क्रैकर सिटी यानी पटाखों के शहर के नाम से जाना जाता है औ शिवकाशी शहर चेन्नई से 500 किमी की दूरी है। 20वीं शताब्दी में शिवकाशी में पहली बार पटाखा कंपनी की शुरुआत हुयी थी। इस छोटे से शहर को पटाखों का शहर बनाने का क्रेडिट पी अय्या नादर और उनके भाई शनमुगा नादर को जाता है। इन्होंने ही अनिल ब्रांड के पटाखों का निर्माण किया था। शिवकाशी को बनाया पटाखा हब 1923 में ये दोनों भाई माचिस बनाने का तरीका सीखने के लिए कोलकाता गये थे। उसके बाद इन्होंने ये बिजनेस शुरू किया और दोनों ने अपनी पहली कंपनी खोली और आज एक छोटी सी कंपनी से पूरा शहर पटाखा हब बन गया शिवकाशी पटाखा उत्पादन की पहली पसंद इसलिए है क्योंकि यहा का क्लाइमेट ड्राइ है यहां हमेशा कम बारिश होती है। इसलिए पटाखा व्यवसाय के लिए यह सबसे उत्तम जगह है। यहा वर्ष के लगभग 300 दिन पटाखों का निर्माण होता है और दीवाली की रात सिर्फ 4-5 घंटे में इसकी खपत हो जाती है।
पटाखों के लिए देश में बना 1940 में कानून
1940 में Indian Explosive Rules बन गये। आतिशबाजी के उत्पादन के लिए लाइसेंस भी मिलना शुरू हो गया। इसके बहुत सारे नियम कानून बनाये गये। 1940 में पहला लाइसेंसी पटाखा फैक्टरी की शुरुवात हुई। दुसरे विश्व युद्ध के बाद बहुत से फायरवर्क्स इंडस्ट्री खुलने शुरू हो गय। जैसे कलिसवारी फायरवर्क्स , नेशनल फायरवर्क्स , शिवकाशी फायरवर्क्स , अनिल ब्रांड आदि। पटाखा इंडस्ट्री होने के कारण यहां कई बार बड़े बड़े हादसे भी हुए है। 2009 में हुए हादसे में लगभग 40 लोगों की जान गयी थी। 2001 में 30 लोगों की और 1991 में 60 लोगों की जान गयी थी। हर साल लगभग 20-25 वर्कर इस इंडस्ट्री में घायल होता है। पटाखा इंडस्ट्री में वे अपनी जान जोखिम में डाल काम करने जाते हैं। एक आदमी के उपर लाखों लोगों की जान टिकी होती हैं। एक वर्कर गलती करता है तो वहा लाखों लोगों की जान खतरे में पड़ जाती है।











