रांचीः नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मंगलवार को लोकभवन जाकर राज्यपाल संतोष गंगवार से मुलाकात की। उन्होंने झारखंड में हुए शराब घोटाले की जांच सीबीआई से कराने को लेकर मांग पत्र राज्यपाल को सौंपा। पत्र में राज्य के 750 करोड़ रुपये से अधिक के शराब घोटाले में एसीबी (एंटी करप्शन ब्यूरो) को तुरंत चार्जशीट दाखिल करने के लिए निर्देशित करने का अनुरोध किया गया है। मरांडी ने पत्र में लिखा है कि एसीबी इस गंभीर आर्थिक अपराध की निष्पक्ष जांच करने की बजाय भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही है। एसीबी तय समयसीमा में चार्जशीट दाखिल नहीं कर रही है।
ACB अब तक झारखंड शराब घोटाले के किसी भी आरोपी के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल करने में विफल रही है, जिसके परिणामस्वरूप सभी आरोपियों को डिफॉल्ट बेल मिल गई। आरोपियों को जेल भेजने के बाद ACB द्वारा उनसे उगाही भी की गई...
इसी गंभीर विषय को लेकर आज माननीय राज्यपाल महोदय से मुलाकात कर… pic.twitter.com/Ysa2F2mTf8
— Babulal Marandi (@yourBabulal) March 31, 2026
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उन्होंने कहा कि ACB अब तक झारखंड शराब घोटाले के किसी भी आरोपी के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल करने में विफल रही है, जिसके परिणामस्वरूप सभी आरोपियों को डिफॉल्ट बेल मिल गई। आरोपियों को जेल भेजने के बाद ACB द्वारा उनसे उगाही भी की गई।पत्र में आरोप लगाया गया है कि 20 मई 2025 को तत्कालीन उत्पाद सचिव IAS विनय कुमार चौबे और संयुक्त उत्पाद आयुक्त गजेंद्र सिंह को गिरफ्तार किया गया था।
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21 मई 2025 को झारखंड स्टेट बेवरेजेज कारपोरेशन लिमिटेड के महाप्रबंधक (वित्त) सुधीर कुमार दास, पूर्व महाप्रबंधक सुधीर कुमार और प्लेसमेंट एजेंसी के नीरज कुमार को गिरफ्तार किया गया।इसके बाद अक्टूबर 2025 में महाराष्ट्र और गुजरात से 7 अन्य आरोपियों की भी गिरफ्तारी हुई थी, लेकिन इन गिरफ्तारियों के बाद एसीबी ने भ्रष्टाचारियों को बचाने की साजिश रची। 20 मई को गिरफ्तार किए गए गजेंद्र सिंह को महज 56 दिनों के बाद 15 जुलाई 2025 को जमानत मिल गई थी।इससे भी अधिक गंभीर बात यह रही कि मुख्य आरोपी IAS विनय चौबे को 19 अगस्त 2025 को न्यायालय से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 187(2) के तहत डिफाल्ट बेल मिल गई थी।विनय चौबे की तरह ही अगले दिन, 20 अगस्त 2025 को सुधीर कुमार दास, सुधीर कुमार और नीरज कुमार को भी न्यायालय से जमानत दे दी गई थी। बाबूलाल मरांडी ने कहा कि इन सभी रसूखदार आरोपियों को यह जमानत इसलिए मिली, क्योंकि एसीबी ने जानबूझकर 90 दिनों की निर्धारित वैधानिक समय-सीमा के भीतर न्यायालय में उनके खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल ही नहीं किया।


