बिहार ने वोटिंग में रचा इतिहास, टूट गया 75 साल का रिकॉर्ड; नीतीश, तेजस्वी या प्रशांत- किसकी चमकेगी किस्मत

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November 7, 2025

Bihar created history in voting, 75 year old record broken

Bihar Chunav Voter Turnout: बिहार विधानसभा चुनाव में गजब हो गया। वोटिंग में बिहार ने नया इतिहास रच दिया। अब तक के सारे रिकॉर्ड टूट गए। पहले चरण की वोटिंग में 75 साल का रिकॉर्ड टूट गया। बिहार के वोटरों ने खूब वोटिंग की। नतीजा यह हुआ कि पहले चरण में बिहार चुनाव में मतदान प्रतिशत के सभी रिकॉर्ड टूट गए।

चुनाव आयोग के अनुसार बिहार में पहले चरण में अब तक का सबसे अधिक 64.66% वोटर टर्नआउट रहा। बिहार के इतिहास में किसी भी चुनाव में इतनी वोटिंग नहीं हुई थी। बिहार में विधानसभा चुनाव के पहले चरण में गुरुवार को 121 निर्वाचन क्षेत्रों में 3.75 करोड़ मतदाताओं में से 64.66 फीसदी वोटरों ने अब तक का सबसे अधिक मतदान किया।

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इस वोटिंग प्रतिशत से दोनों खेमा खुश है। एक एंटी इनकंबेंसी के खिलाफ वोटिंग बता रहा तो दूसरा खेमा प्रो इनकंबेंसी। चुनाव आयोग के मुताबिक, बिहार विधानसभा चुनाव के पहले फेज की वोटिंग में 64.66 फीसदी वोटिंग हुई। यह 1951 के बाद अब तक सबसे अधिक है। यह 75 सालों में पहली बार है। इससे पहले 1998 में 64 फीसदी मतदान हुआ था। मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर में वोटिंग टर्नआउट 70 फीसदी से अधिक रहा।

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तिरहुत और मिथिला के चार जिलों के 39 विधानसभा सीटों के लिए हुए मतदान में इस बार मतदान प्रतिशत बढ़ा है। गुरुवार को संपन्न हुए पहले चरण के मतदान में मुजफ्फरपुर के 11, वैशाली के 8, समस्तीपुर के 10 और दरभंगा के 10 विधानसभा सीटों पर वोट डाले गए। इस बार वैशाली में 6, दरभंगा में 7, मुजफ्फरपुर में 8 और समस्तीपुर में 14 फीसदी मतदान प्रतिशत बढ़ा है। वर्ष 2020 के विस चुनाव में मुजफ्फरपुर में 63, दरभंगा में 56, समस्तीपुर में 57, वैशाली में 57 फीसदी वोट पड़े थे।

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यह विस चुनाव पिछले चुनावों से कई मायनों में अलग है। लोगों में मतदान के प्रति उत्साह नजर आया। वोटिंग प्रतिशत में बढ़ोतरी के पीछे मुख्यत: तीन वजह नजर आ रहे हैं- लोक-लुभावन वादे, महिला मतदाताओं में उत्साह और प्रवासी वोटरों की मौजदूगी। विपक्षी महागठबंधन के सीएम पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने इसका तीन गुना यानी तीस हजार प्रति वर्ष देने का वादा किया।

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चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक पार्टियों ने वोटरों को लुभाने के लिए जो वादों की बौछार की उससे लोगों में उत्साह आया। खासकर महिलाओं व युवाओं में। नौकरियों के सृजन, उद्योग-धंधे स्थापित करने, सड़कों का जाल बिछाने, गांव और शहर के बीच बेहतर कनेक्टिविटी, स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने, पलायन रोकने जैसे वादों ने सबका ध्यान आकृष्ट किया।

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सभी राजनीतिक दलों ने चुनावी वादों से वैसे तो हर वर्ग को लुभाने की कोशिश की है पर केंद्र बिंदु में महिला व युवा मतदाता रहे। इसका असर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की चुनावी सभाओं में स्पष्ट दिखाई दिया।एनडीए और महागठबंधन दोनों में ही महिला मतदाताओं को लुभाने की होड़ रही। जहां सत्ताधारी एनडीए ने चुनाव की घोषणा होने से पहले ही महिलाओं के खाते में दस हजार की वित्तीय सहायता राशि भेजकर बड़ा दांव खेल दिया।

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मिथिला व तिरहुत के प्रवासी बड़ी संख्या में इस बार मतदान करने के लिए छठ बाद लौटे नहीं। लुभावने वादों से प्रवासी मतदाताओं का मन डोल उठा और खूब मतदान किया। अब उन्होने अपना बहुमूल्य वोट किसे दिया है यह तय कर पाना इतना आसान नहीं क्योंकि एनडीए अपने पिछले कार्यकाल में किये गए विकास कार्यों का हवाला देते हुए वोट मांगा है तो महागठबंधन व जन सुराज ने सूबे में बदलाव लाने का वादा कर मतदाताओं को लुभाया है।

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