झारखंड हाईकोर्ट ने खारिज की रिम्स की अपील, अनुबंध पर बहाल नर्सो को दी बड़ी राहत

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रांचीः झारखंड हाईकोर्ट ने रिम्स (राजेन्द्र आयुर्विज्ञान संस्थान) की एक महत्वपूर्ण अपील को खारिज करते हुए, अनुबंध पर नियुक्त नर्सों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि इन नर्सों की सेवाएं 21 अक्टूबर 2014 से ही नियमित मानी जाएंगी।सुनवाई के दौरान रिम्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अशोक कुमार सिंह ने दलीलें पेश कीं, जबकि याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता शादाब बिन हक ने पैरवी की।

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यह मामला रिम्स बनाम लिली कुजूर एवं अन्य से संबंधित है, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने अनुबंधित होने के बावजूद नियमितीकरण की मांग की थी। सिंगल बेंच ने 2021 में उनके पक्ष में निर्णय दिया था, जिसे चुनौती देते हुए रिम्स ने अपील दायर की थी।

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पृष्ठभूमि: भर्ती से लेकर विवाद तक

रिम्स ने वर्ष 2002 में एक विज्ञापन जारी कर अनुबंध आधारित स्टाफ नर्स की नियुक्ति की थी। चयन के बाद, याचिकाकर्ताओं को 2003 में कार्यभार सौंपा गया।

बाद में, रिम्स ने 11 अक्टूबर 2014 को स्थायी स्टाफ नर्स (ग्रेड-A) की बहाली के लिए नया विज्ञापन निकाला। याचिकाकर्ताओं ने भी आवेदन किया, लेकिन अधिकतम उम्र सीमा पार होने के कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया।.. याचिकाओं की लंबी प्रक्रिया

इस भेदभाव के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने पहले 2015 में रिट दायर की थी। हाईकोर्ट ने 2017 में निर्देश दिया कि रिम्स एक नियमितीकरण नीति बनाए। इसके बाद 2018 में एक बार की उम्र में छूट देने की योजना बनी, और फिर 4 अप्रैल 2018 को नर्सों की सेवाएं नियमित की गईं—लेकिन प्रभावी तिथि रखी गई 8 फरवरी 2018।

इस तिथि को लेकर याचिकाकर्ताओं ने फिर से कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि उन्हें 21 अक्टूबर 2014 से नियमित माना जाए, जैसा कि अन्य नर्सों के साथ किया गया।

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रिम्स की दलीलें खारिज

रिम्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अशोक कुमार सिंह ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता अनुबंध पर थे, जबकि अन्य नर्सें नियमित प्रक्रिया के तहत नियुक्त थीं। उन्होंने 2014 के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि दोनों वर्ग अलग हैं और उन्हें समान लाभ नहीं मिल सकता।

लेकिन अदालत ने माना कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति भी एक विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के बाद हुई थी, इसलिए उन्हें भेदभाव के आधार पर अलग नहीं रखा जा सकता।

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फैसले की व्याख्या: ‘क्लास के भीतर क्लास’ असंवैधानिक

न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय और दीपक रोशन की खंडपीठ ने कहा कि सरकार या संस्थान द्वारा ‘क्लास के भीतर क्लास’ बनाना स्पष्ट भेदभाव है। किसी तिथि विशेष को आधार बनाकर सेवा नियमित करना मनमाना और असंगत है, खासकर जब चयन प्रक्रिया और सेवा शर्तें समान हों।

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निष्कर्ष और परिणाम

झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता नर्सों की सेवाएं 21 अक्टूबर 2014 से मानी जाएंगी नियमित और इसके अनुसार उन्हें सभी वेतन व लाभ मिलने चाहिए।

इस फैसले के बाद झारखंड के स्वास्थ्य क्षेत्र में अनुबंध कर्मियों को लेकर नीतियों और प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता पर नई बहस शुरू हो सकती है।

 

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