कौन है चानकू महतो(Chanku Mahto), जिन्हें याद कर रहा है कुड़मी समाज, क्रांति के इस नायक को क्यों नहीं याद करता इतिहास ?

Chanku Mahto

कौन है चानकू महतो (Chanku Mahto) जिसे झारखंड के महतो समाज के नेता श्रद्घाजंलि दे रहे हैं। इतिहास की किताबों में आखिर चानकू को क्यों नहीं याद किया गया और क्यों सवर्ण समाज उन्हें अपना नायक मानता है । ऐसे तमाम सवाल हर साल पंद्रह मई को उठते हैं जब चानकू महतो की शहादत को करते हैं याद ।

कौन है चानकू महतो ?

चनकू महतो (Chanku Mahto) झारखंड का एक ऐसा नायक जिसे इतिहासकारों ने भूला दिया । लेकिन आज भी प्राचीन राड़ सभ्यता के वशंज अपने इस नायक को याद करना नहीं भूलते । बात बहुत साल पहले की है तब आजादी की पहली लड़ाई 1857 की क्रांति भी नहीं हुई थी उससे पहले झारखंड में हूल विद्रोह हो चुका था । इसी हूल विद्रोह के नायक थे चानकू महतो जिन्होंने अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिए थे ।  गोड्डा के रंगमटिया गांव में 9 फरवरी, 1816 को जन्मे चानकू महतो बचपन से ही साहसी और नेतृत्व करने की क्षमता विकसित कर चुके थे । अपनी इन्हीं खूबियों की वजह से  गांव का प्रधान बने और फिर कुड़मि स्वशासन व्यवस्था के परगना के परगनैत भी बने। इसी दौरान ईस्ट् इंडिया कंपनी गोड्डा इलाके में भी दाखिल हो चुकी थी । अंग्रेजों ने उस भूमि पर कर लगा दिया था  जिसे आ तक राड़ या कु़ड़मी समाज सार्वजनिक मानते रहे थे, जल-जंगल औऱ जमीन पर जिनका हक था उन्हें टैक्स देना नागवार गुजरा । चानकू महतो यह सब देख रहे थे ।

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अंग्रेजों ने चानकू महतो के समाज को किया तबाह

इतना ही नहीं अंग्रेजों ने इनके पारपंरिक स्वशासन पर भी हमला बोल दिया था। गांव की एक अलग वैकल्पिक सरकार खड़ी कर दी। मनमानी बढ़ने लगी  तब आदिवासियों-मूलवासियों ने जवाब देने की ठानी। विद्रोह ही एकमात्र रास्ता था और इसके लिए गांव-गांव बैठकें होने लगीं और लोग एकजुट होने लगे। चानकू महतो ने नेतृत्व संभाला। चानकू ने नारा दिया ‘आपोन माटी, आपोन दाना, पेट काटी निही देबञ खजाना।’ हूल क्रांति से पहले 1853-54 में अपने प्रमुख सहयोगियों राजवीर सिंह, बेजल सोरेन, भागीरथ मांझी, हुघली महतो, बुधु राय, बलुआ महतो, रामा गोप, चालो जोलहा, गांदो, हरदेव सिंह के साथ जमींदारों और कंपनी सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। हूल क्रांति की तैयारी चल रही थी और चानकू महतो इस आंदोलन में अपने पूरे साथियों के साथ शामिल हो गए। सिदो-कान्हू ने 30 जून, 1855 को विशाल सभा या कहिए विद्रोह की तिथि निर्धारित की। सभा में पूरे संताल परगना से लोग एकत्रित हुए और विद्रोह कर दिया। इस आंदोलन की बौद्धिक अगुवाई शाम परगना कर रहे थे। इस विद्रोह में हजारों आदिवासी मारे गए। आंदोलन के कई अगुवा बच गए। चानकू महतो भी पुलिस की पकड़ में न आ सके। हूल क्रांति में संताली, महतो व तमाम स्थानीय जातियों ने योगदान दिया था और हजारों आदिवासी बलिदान हो गए थे।

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चानकू महतो का नाम संताल विद्रोह के गीतों में इस तरह याद किया जाता है

सिद्धू कनु खुरखुरीर ऊपरे, चांद-वैरब लहरे लहरे; चंकू महतो, रामा गोप लहरे लहरे, चल्लू जोलहा लहरे।

उनका नारा था

…  आपों मति, आपों दाना, पेट काति नहि देबो खजाना।

विद्रोही नायक बन गए चानकू महतो

चानकू महतो (Chanku Mahto)को पुलिस खोज रही थी। महीनों तक पुलिस और चानकू के बीच लुकाछिपी का खेल चलता रहा। सन् 1855 के अक्टूबर महीने में सोनार चक में जनसभा थी। उसमें चानकू शामिल हुए और लोगों को संबोधित कर रहे थे कि एक गद्दार नायब प्रताप नारायण ने अंग्रेजी सरकार को उनकी उपस्थिति की सूचना दे दी। अंग्रेजी सेना ने तेजी से कार्रवाई करते हुए चानकू महतो को चारों तरफ से घेर लिया और युद्ध शुरू हो गया। इस हमले में चानकू घायल हो गए, लेकिन उनके साथी उन्हें सुरक्षित स्थान पर लेकर चले गए। चानकू महतो एक बार फिर पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके। अब पुलिस का गुस्सा सातवें आसमान पर था। पुलिस को किसी ने सूचित कर दिया कि चानकू महतो अपने ननिहाल बाड़ेडीह गांव में हैं। पुलिस यहां चुपके से पहुंची और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद 15 मई, 1856 को गोड्डा के राजकचहरी स्थित कझिया नदी के किनारे उन्हें फांसी दे दी गई। अंग्रेजी सेना इतने गुस्से में थी कि 1856 में बाड़ेडीह महतो टोले को पूरी तरह उजाड़ दिया।

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