तारीख: 11 जनवरी 2005
जगह: बगोदर, गिरिडीह (झारखंड)
चुनावी मौसम था। मंच से गरजती आवाज़ सत्ता के हर चेहरे को बेनकाब कर रही थी। कॉमरेड महेंद्र सिंह बता रहे थे कि कैसे ग्लोबल टेंडर के नाम पर गिरिडीह की सड़कें मलेशिया की कंपनी बनाती है और पेटी कॉन्ट्रैक्ट आंध्र प्रदेश के ठेकेदारों को मिलता है। बीजेपी, कांग्रेस, लालू यादव—कोई भी उनकी आलोचना से अछूता नहीं था।
यह उनकी आख़िरी सार्वजनिक गर्जना थी। ठीक पाँच दिन बाद, वही सड़कें उनके खून से लाल थीं।
16 जनवरी 2005: जब सवाल पूछा गया—“कॉमरेड महेंद्र सिंह कौन है?”
बगोदर की सड़कों पर बाइक सवार हत्यारों ने पूछा—“कॉमरेड महेंद्र सिंह कौन है?” उन्होंने सामने आकर कहा—“मैं हूँ।” और पल भर में गोलियाँ दाग दी गईं। झारखंड की सबसे बुलंद आवाज़ हमेशा के लिए ख़ामोश कर दी गई।आज, 21 साल बाद भी हत्यारों को सज़ा नहीं मिल सकी है। गवाहियों का सिलसिला जारी है, और मामले की जांच सीबीआई के पास है। न्याय अब भी अधूरा है।
कविता, प्रेम और मुक्ति का संकल्प
कॉमरेड महेंद्र सिंह ने अपना कविता-संग्रह “कीमत चुकाती ज़िंदगी” समर्पित किया—
उन सभी के नाम / जिन्होंने / प्रेम और मुक्ति के लिए / जिया और मरे।”
उनकी कविता ‘उम्मीदें’ आज भी संघर्षरत समाज को रास्ता दिखाती है—
“कोई कहता है / इस काली रात में / उस फीकी, पकड़ से फिसलती रोशनी की बात / व्यर्थ है / कोई जवाब देता है / पर वही तो भोर का संदेश है।”
हत्या नहीं, एक आंदोलन को कुचलने की कोशिश
उनकी कायरतापूर्ण हत्या आदिवासियों, भूमिहीन-गरीब किसानों और कोयला मज़दूरों के संघर्ष को कुचलने की साज़िश थी। गोलियों और चाकुओं से उन्हें छलनी किया गया—यह उस घृणा का प्रतीक था, जो फासीवादी ताक़तें झारखंड के जंगलों और खेतों में चल रहे अदम्य संघर्षों के प्रति रखती हैं। कोयला माफ़िया और उसके संरक्षक सत्ता प्रतिष्ठान ने सोचा कि एक जननायक को मारकर आंदोलन को तोड़ा जा सकता है—पर ऐसा नहीं हुआ।
खम्बरा से विधानसभा तक
1954 में गिरिडीह ज़िले के खम्बरा गाँव में जन्मे महेंद्र सिंह साधारण किसान परिवार से थे। 1970 के दशक में नक्सलबाड़ी आंदोलन के दमन के बाद भी भोजपुर-पटना क्षेत्र में उठती लहर ने उन्हें आकर्षित किया।
1978 से वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के संगठक बने। 1980 के दशक में बगोदर में खेत मज़दूरों, ग्रामीण निम्न-मध्यवर्ग, अल्पसंख्यकों और गरीब राजपूत समुदाय को संगठित कर उन्होंने ऐसा सामाजिक आधार बनाया, जो आज भी कायम है।
जेल भी बना संघर्ष का मैदान
झूठे मुकदमों में बार-बार गिरफ़्तारी, 1985 में आजीवन कारावास की सज़ा—पर उन्होंने गिरिडीह जेल को भी आंदोलन का मंच बना दिया। क़ैदियों को संगठित किया, जेल प्रशासन के अत्याचारों को उजागर किया। अंततः उच्च न्यायालय ने उन्हें निर्दोष माना और रिहा किया।
सदन के भीतर और बाहर—अघोषित विपक्ष
1990 से लगातार तीन बार बगोदर से विधायक चुने गए। झारखंड राज्य बनने के बाद वे विधानसभा में अकेले वाम विधायक थे, फिर भी भूमि घोटालों, जनकल्याण योजनाओं में भ्रष्टाचार और सत्ता-अपराध गठजोड़ को उन्होंने दस्तावेज़ों के साथ बेनकाब किया। समानांतर पंचायत, कोयला मज़दूर यूनियन की अगुवाई, कोयल कारो बाँध और स्टरलाइट खनन विरोधी आंदोलन—हर मोर्चे पर वे अग्रिम पंक्ति में रहे।
विरासत जो आज भी ज़िंदा है
सड़क, सदन, अदालत और जेल—हर जगह उनकी मौजूदगी सत्ता के लिए चुनौती थी। चौथी बार चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाख़िल करने के एक दिन बाद उनकी हत्या कर दी गई। पर कॉमरेड महेंद्र सिंह की विरासत—साहसी, रचनात्मक संघर्षों की विरासत—आज भी लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की ताक़तों के लिए भोर का संदेश है।उनकी आवाज़ भले चुप करा दी गई हो, पर संघर्ष की वह गूंज आज भी झारखंड की धरती पर ज़िंदा है।




