झारखंड को पुलिस फोर्स में महिलाओं की भागीदारी का लक्ष्य पूरा करने में लग जाएंगे 200 वर्ष: IJR का खुलासा, थानों में CCTV में भी फिसड्डी

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Live Dainik

April 17, 2025

jharkhand police ijr

नई दिल्ली: इंडिया जस्टिस रिपोर्ट (IJR) 2025 ने देश की पुलिस व्यवस्था, न्यायिक प्रक्रिया और कानूनी सहायता से जुड़े बुनियादी ढांचे की गंभीर खामियों को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, देश की आधी पुलिस फोर्स के पद अब भी खाली हैं, और जेलों में कैदियों की संख्या क्षमता से कहीं अधिक हो गई है। झारखंड के परिप्रेक्ष्य में एक इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जिस हिसाब से पुलिस फोर्स में महिलाओं की भागीदारी दी जा रही है उस रफ्तार से झारखंड को लक्ष्य पूर्ति में सौ वर्ष लग जाएंगे ।

झारखंड में पुसिस में महिलाएं

IJR 2022 की तुलना में, IJR 2025 में 22 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने अपनी पुलिस फोर्स में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को मामूली रूप से बढ़ाया है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, आंध्र प्रदेश और बिहार ऐसे राज्य हैं जहां पुलिस बल में अगले तीन वर्षों में महिलाओं की भागीदारी 33% तक पहुँच सकती है। हालांकि, झारखंड, त्रिपुरा और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह जैसे राज्यों के लिए यह लक्ष्य अब भी कठिन बना हुआ है। इन राज्यों को महिला प्रतिनिधित्व के कोटे को पूरा करने में करीब 200 साल लग सकते हैं, जो दर्शाता है कि नीति और कार्यान्वयन के बीच गहरी खाई बनी हुई है।

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झारखंड के थानों में सीसीटीवी कैमरों का अभाव

झारखंड में पुलिसिंग की स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पूरे देश में सिर्फ झारखंड ही ऐसा राज्य है जहां थानों में सीसीटीवी कैमरे 50 फीसदी से कम हैं । पूरे देश के 83 फीसदी थानों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जा चुके हैं । लेकिन झारखंड के सैकड़ों थानों को अभी भी सीसीटीवी का इंतजार है।

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पुलिस व्यवस्था अधूरी

रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में पुलिस के 50% पद अब भी खाली हैं। फॉरेंसिक विशेषज्ञों की संख्या भी चिंताजनक है—पूरे देश में मात्र 10,000 विशेषज्ञ कार्यरत हैं। इतना ही नहीं, 176 जेलों में ऑक्युपेंसी दर 200% से अधिक है, जिससे जेल व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है।

विचाराधीन कैदियों की स्थिति चिंताजनक

20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 20% से अधिक विचाराधीन कैदी ऐसे हैं, जो 1 से 3 साल से अधिक समय से बिना सजा के हिरासत में हैं। इससे न्याय प्रक्रिया में देरी और मानवाधिकार उल्लंघन की गंभीर चिंता उत्पन्न होती है।

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न्यायिक स्टाफ की भारी कमी

देशभर में करीब 5.7 लाख मामलों के निपटारे के लिए न्यायिक और वैज्ञानिक विशेषज्ञों की भारी कमी है। 25 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में इन पदों पर नियुक्तियाँ अब भी लंबित हैं, जिससे लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

कानूनी सहायता भी प्रभावित

रिपोर्ट बताती है कि जरूरतमंद लोगों को मिलने वाली कानूनी सहायता में भारी गिरावट आई है। 2019 के बाद से पैरा-लीगल वॉलंटियर्स की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई है। केवल 38% मामलों में ही प्रभावी कानूनी सहायता मिल पाई है।

पुलिस प्रशिक्षण में कमी

देश का औसतन केवल 1.25% पुलिस बजट प्रशिक्षण पर खर्च किया जा रहा है, जिससे पुलिस बल की दक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

आरक्षण का पालन नहीं

बहुत से राज्यों में न्यायपालिका और पुलिस में SC/ST/OBC वर्गों के लिए निर्धारित आरक्षण का पालन नहीं किया जा रहा है। इससे सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर भी सवाल उठते हैं।

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मानवाधिकार आयोग निष्क्रिय

रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा स्वत: संज्ञान लेने की दर केवल 4% रही है, जो अत्यंत कम मानी जा रही है।

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