रांचीः आदिवासियों के मसीहा कहे जाने वाले दिशोम गुरु शिबू सोरेन के सरेंडर करने की एक दिलचस्प कहानी है। एक ऐसा आईएएस अधिकारी थे जो अगर नहीं होते तो शिबू सोरेन का पुलिस एनकाउंटर कर देती। उस अधिकारी की दखल से न सिर्फ पुलिस की कार्रवाई रूक गई बल्कि शिबू सोरेन ने सरेंडर भी कर दिया। चार अगस्त 2025 को दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में शिबू सोरेन की मौत के बाद पांच अगस्त को उनके पैतृक गांव रामगढ़ जिले के नेमरा में उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान नेमरा में भारी संख्या में शिबू सोरेन को चाहने वाले, उनके समर्थक और प्रशंसक पहुंचे। सत्ता पक्ष और विपक्ष की दीवार को तोड़ते हुए दिशोम गुरु को श्रद्धांजलि देने लोग रांची और नेमरा पहुंचे।
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शिबू सोरेन के निधन के बाद आदिवासियों के मसीहा कहे जाने वाले दिशोम गुरू शिबू सोरेन को लेकर एक दिलचस्प कहानी हम आपको बता रहें है। शिबू सोरेन ने जमीन से बेदखल किए गए आदवासियों, कोयला खदान में काम करने वाले मजदूरों के लिए जो अवाज उठाई और लड़ाई लड़ी वो बाद में दुनिया के लिए नजीर बन गई। 1970 के बाद शिबू सोरेन एक ऐसी शख्सियत बनकर उभरे, जिनके पीछे पूरा आदिवासी समाज खड़ा था और लोग उनके लिए कुछ भी करने को तैयार थे। लेकिन हालात हमेशा ऐसे नहीं थे। एक ऐसा भी वक्त आया था, जब शिबू सोरेन को एनकाउंटर में मारने का प्लान बन गया था। आइए जानते हैं कैसे एक आईएएस अफसर की कोशिश ने उन्हें सरेंडर करवाया और एनकाउंटर से बचाया।
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शिबू सोरेन को एनकाउंटर में ढेर करने का था प्लान
बात 1970 के बाद की है। झारखंड में धनकटी आंदोलन और झारखंड को अलग राज्य बनाने का आंदोलन तेज हो गया था। इस दौरान एक सबसे बड़ा नाम उभरकर सामने आया जो इन आंदोलनकारियों का मसीहा बना हुआ था। इस आंदोलनकारी का नाम था शिवचरण मांझी, जो बाद में शिबू सोरेन के और आदिवासियों के मसीहा के रूप में जान गए। झारखंड को अलग राज्य बनाने और आदिवासियों की जमीन वापस लेने के लिए जमींदारों के खिलाफ जो आंदोलन शिबू सोरेन ने चलाया वो हिंसक हो गया। ऐसे में केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों की नजरों में शिबू सोरेन खटकने लगे थे। ऐसा दावा किया जाता है कि सरकार ने उन्हें एनकाउंटर में मारने का प्लान बना लिया था, लेकिन तभी कहानी में एक ट्विस्ट आता है। एंट्री होती है एक आईएएस अफसर केबी सक्सेना की। केबी सक्सेना को जिम्मेदारी दी गई कि झारखंड में चल रहे शिबू सोरेन के आंदोलन को किसी तरह खत्म हो और उन्हें गिरफ्तार किया जाए।
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एक SHO ने केबी सक्सेना को बताया सच
जब केबी सक्सेना धनबाद के उपायुक्त बनकर पहुंचे तो चार्ज लेते ही अपने मिशन पर लग गए। इस दौरान एक किंचिग्या नाम के एसएचओ ने केबी सक्सेना को शिबू सोरेन का सच बताया। किंचिग्या ने बताया कि शिबू सोरेन अपराधी नहीं, बल्कि आदिवासियों के मसीहा हैं। हालांकि, उनका आंदोलन हिंसक था। किंचिग्या की बातें सुनकर उपायुक्त केबी सक्सेना का मन बदला और उन्होंने शिबू सोरेन को मुख्यधारा में लाने का मन बना लिया। एक दिन जब शिबू सोरेन टुंडी के जंगलों में मौजूद थे, तभी केबी सक्सेना उनसे मिलने के लिए पहुंचे। केबी सक्सेना को देखकर शिबू सोरेन की सुरक्षा में लगे उनकी साथी अक्रामक हो रहे थे लेकिन शिबू सोरेन ने उन्हें मना किया और केबी सक्सेना को अपने पास आने दिया और बातचीत की।
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केबी सक्सेना शिबू सोरेन को कैसे करवाया सरेंडर
चूंकि एसएचओ किंचिग्या ने शिबू सोरेन से केबी सक्सेना के बारे में बताया था कि वो अच्छे अफसर हैं। यही वजह थी कि इंदिरा गांधी से भी मिलने से मना कर देना वाले शिबू सोरेन ने उनसे मिलने का फैसला किया। जब केबी सक्सेना दिशोम गुरू शिबू सोरेन से मिलने पहुंचे तो उन्होंने कहा कि मैं आया तो आपके खात्मे के लिए था और मैं आपको बता दूं कि जिस हिंसा के रास्ते पर आप चल रहे हैं, पुलिसवाले एक ना एक दिन आपका एनकाउंटर कर देंगे। केबी सक्सेना शिबू सोरेन को समझाते हुए कहा कि आप आदिवासियों के उद्धार के लिए इतना बड़ा काम कर रहे हैं, बस आप अब हिंसा का रास्ता छोड़कर कानून के रास्ते पर चलना शुरू कीजिए और मुख्यधारा में लौट आइए। इस दौरान केबी सक्सेना ने उनके खिलाफ चल रहे केसों को वापस करवाने का भी वादा किया। शिबू सोरेन थोड़ी देर चुप रहे और केबी सक्सेना से कहा कि मुझे सोचना का वक्त दो। अगले दिन केबी सक्सेना शिबू सोरेन को सरेंडर करवाने के लिए पहुंचते, इससे पहले ही उनका ट्रांसफर हो गया। इसके बाद लक्ष्मण शुक्ल नाम के अधिकारी की तैनाती की गई, जिससे केबी सक्सेना अपना अधूरा काम करने के लिए कहा। लक्ष्मण शुक्ल ने शिबू सोरेन को सरेंडर करवाया और अपने साथ लेकर थाने गए। इस तरह आदिवासियों के सबसे बड़े नेता शिबू सोरेन ने सरेंडर कर दिया।
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हत्या और अपहरण के आरोप, क्या था सच?
शिबू सोरेन पर चिरुडीह हत्याकांड (1975) और शशिनाथ झा हत्याकांड (1994) जैसे गंभीर आरोप लगे। उन्होंने कुछ समय हिरासत में बिताया, लेकिन बाद में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। इन विवादों ने उनके राजनीतिक जीवन की छवि को दोधारी बना दिया।
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2007 का हमला: जब बाल-बाल बचे ‘दिशोम गुरु’
गिरिडीह से पेशी के बाद लौटते समय देवघर जिले में उनके काफिले पर बम फेंका गया। यह हमला उन्हें खत्म करने की एक साजिश थी, लेकिन वह बच निकले और आदिवासी नेता के रूप में और मजबूत हुए।










