यूपी में जदयू ने भी बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ा है,
प. बंगाल, दिल्ली की तरह झारखंड-बिहार-यूपी में निषाद समाज को एससी-एसटी में शामिल कराएंगे
रांची। बिहार के पशुपालन और मत्स्य संसाधन मंत्री सह विकासशील इंसान पार्टी, वीआईपी के संस्थापक मुकेश सहनी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद भाजपा नेताओं की ओर से हो रहे कटाक्ष पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। मुकेश सहनी ने शनिवार को रांची में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ जदयू ने भी उम्मीदवार थे, ऐसे में भाजपा नेताओं और उनके प्रवक्ताओं में दम हैं, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ बयान दे लें। उन्होंने कहा कि मणिपुर में भी भाजपा को ही हरा कर जदयू ने सात सीटों पर जीत हासिल की हैं,ऐसे में सिर्फ एक गरीब के बेटे पर ही वार करना कहां तक उचित होगा।
मुकेश सहनी ने कहा कि पार्टी निषाद समाज के हक और अधिकार की लड़ाई लड़ रही है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल और दिल्ली की तरह झारखंड-बिहार-उत्तर प्रदेश में निषाद समाज को एसटी-एससी में शामिल कराना पार्टी का लक्ष्य हैं। उन्होंने कहा कि वे झारखंड में सत्ता नहीं, बल्कि निषाद और अति पिछड़ों को हक और अधिकार की लड़ाई लड़ने आये हैं।
मुकेश सहनी ने कहा कि झारखंड-बिहार और उत्तर प्रदेश से निषाद समाज को एससी-एसटी में शामिल कराने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जा चुका हैं, केंद्र सरकार जल्दी मांग पूरी करें, इसके लिए लड़ाई लड़नी है। उन्होंने कहा कि वीआईपी झारखंड में पार्टी संगठन को मजबूत बनाएगी और निषाद समाज को राजनीतिक हिस्सेदारी उपलब्ध कराएगी। उन्होंने कहा कि निषाद समाज को कोई दल टिकट नहीं देता है और यहां निषाद समाज का कोई विधायक भी नहीं हैं।
मुकेश सहनी ने कहा कि बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य निर्माण करने का मुख्य उद्देश्य राज्य का तेजी से विकास था, समाज के निलचे, दबे कुचलों को उनक हक अधिकार मिल सके तथा वनवासियों को विकास के पथ पर लाया जा सके। सन ऑफ मल्लाह के नाम से चर्चित मुकेश सहनी ने कहा कि जब से बिहार में अति पिछड़ों के आरक्षण को 15 प्रतिशत बढ़ाने की मांग की है, तब से राजनीतिक दलों के वे निशाने पर आ गये हैं। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि आज इसी हक की लड़ाई लड़ने के लिए लोगों का प्यार मिलता है, तो फिर क्यों नहीं इनके हक और अधिकार की लड़ाई लड़ूं? उन्होंने कहा कि अब तक अति पिछड़ों के कल्याण के लिए नारे खूब लगे, सियासत में इनके वोटों का भी खूब इस्तेमाल किया गया, लेकिन अब समय आ गया है कि यह अधिकार मांगा नहीं जाए, बल्कि इसके लिए लड़ाई लड़ी जाए।



