लोहरदगा जिले के ग्रामीण इलाकों में बॉक्साइट लदे हाईवा वाहनों के आवागमन को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। बीते करीब तीन महीनों से यह मामला लगातार गरमाया हुआ है और अब यह स्थानीय लोगों के आक्रोश का बड़ा कारण बन चुका है।ग्रामीणों का आरोप है कि जिन सड़कों को उन्होंने अपने गांव के आवागमन के लिए जमीन देकर बनवाया था, आज उन्हीं सड़कों का इस्तेमाल कंपनियां अपने व्यावसायिक हित के लिए कर रही हैं। पहले जहां सड़क की चौड़ाई 8 से 12 फीट तक थी, उसे बढ़ाकर करीब 33 फीट कर दिया गया है। इस चौड़ीकरण में कई ग्रामीणों की जमीन चली गई, लेकिन उन्हें न तो मुआवजा मिला और न ही इस विषय में उनसे कोई बातचीत की गई।

लोहरदगा के सेन्हा में तस्करी कर ले जाते 28 पशु जब्त, तस्कर फरार
स्थानीय लोगों का कहना है कि कंपनी और जिला प्रशासन ने मिलकर बिना सहमति के यह काम किया है। इससे न सिर्फ उनकी जमीन प्रभावित हुई है, बल्कि गांव का वातावरण भी बिगड़ गया है। भारी वाहनों के लगातार आवागमन से धूल और प्रदूषण बढ़ गया है, जिससे ग्रामीणों का जीवन प्रभावित हो रहा है।ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधि और प्रभावशाली लोग कंपनी के साथ मिलकर ट्रांसपोर्टिंग का काम कर रहे हैं और बॉक्साइट परिवहन से लाभ कमा रहे हैं, जबकि आम ग्रामीणों को सिर्फ नुकसान झेलना पड़ रहा है। स्थानीय स्तर पर गंधर्व भगत परिवहन, मां मालती इंटरप्राइजेज और बालाजी ट्रांसपोर्ट के माध्यम से बॉक्साइट ढुलाई किए जाने की बात सामने आ रही है, जिसे लेकर भी ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

धनबाद में गैस सिलेंडर कटर ब्लॉस्ट से तीन की मौत, 3 CISF जवान भी घायल
विरोध के रूप में ग्रामीणों ने सड़क पर उतरकर हाईवा वाहनों का आवागमन पूरी तरह ठप कर दिया है। कई जगहों पर लोग एकजुट होकर सड़क जाम कर रहे हैं और किसी भी कीमत पर वाहनों को गांव की सड़क से गुजरने नहीं दे रहे हैं।ग्रामीणों का साफ कहना है, “जान दे देंगे, लेकिन जमीन नहीं देंगे।” उनका कहना है कि जब तक उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिलता और उनकी सहमति नहीं ली जाती, तब तक वे किसी भी हाल में बॉक्साइट लदे वाहनों को अपने गांव की सड़कों से गुजरने नहीं देंगे।

अंबा हो गई है ‘हताशा प्रसाद’, विष्णुगढ़ हत्याकांड के खुलासे पर सवाल उठाने पर भड़के बीजेपी विधायक प्रदीप प्रसाद
हालांकि, कंपनी के प्रतिनिधि स्थानीय नेताओं के माध्यम से ग्रामीणों को मनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। प्रशासन की ओर से भी इस मामले में स्पष्ट हस्तक्षेप नजर नहीं आ रहा है, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण बनी हुई है।यह विवाद अब सिर्फ सड़क और परिवहन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह ग्रामीणों के अधिकार, जमीन और सम्मान से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। आने वाले दिनों में प्रशासन और कंपनी इस समस्या का समाधान कैसे निकालते हैं, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।



