सुशील श्रीवास्वत हत्याकांड के सभी दोषी बरी, झारखंड हाईकोर्ट ने पलटा हजारीबाग कोर्ट का फैसला

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February 19, 2026

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रांचीः झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस आर मुखोपाध्याय और जस्टिस पीके श्रीवास्तव की खंडपीठ ने हजारीबाग सिविल कोर्ट परिसर में हुए कुख्यात अपराधी सुशील श्रीवास्तव और उनके दो साथियों की हत्या के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी दोषियों को बरी कर दिया है। खंडपीठ ने हजारीबाग न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।

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यह घटना दो जून 2015 की है, जब हजारीबाग सिविल कोर्ट परिसर में पेशी के दौरान अपराधी सुशील श्रीवास्तव और उनके दो साथियों कामरान खान और गया खान पर जानलेवा हमला किया गया था। हमलावरों ने एके-47 राइफल से गोलीबारी की थी और हैंड ग्रेनेड भी फेंका था। इस घटना में तीनों की मौत हो गई थी। मामले की जांच के बाद विकास तिवारी, विशाल सिंह, दिलीप साव और राहुल देव पांडेय को आरोपित बनाया गया था। हजारीबाग कोर्ट ने 11 सितंबर 2020 को सभी आरोपितों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस निर्णय के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दाखिल की गई थी।

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हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में बड़ी विसंगतियां हैं। जहां कुछ गवाहों ने दो-तीन हमलावरों की बात कही। वहीं कुछ ने आठ-दस लोगों के होने का दावा किया। अदालत ने कहा कि जिस तरह से फरारी के दौरान एक ही एके-47 राइफल बरामद हुई और बैलिस्टिक रिपोर्ट में दो राइफल के इस्तेमाल की बात कही गई, उससे पीड़ित पक्ष के ही गवाहों के बयानों को बल मिलता है, जिन्होंने दो-तीन हमलावरों की बात कही थी।

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गवाहों की पहचान प्रक्रिया पर सवाल
अदालत ने पुलिस गवाहों की पहचान प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। कई पुलिसकर्मियों ने स्वीकार किया कि उन्होंने आरोपित विकास तिवारी की तस्वीरें अखबारों में देखी थीं और इसके बाद उनकी पहचान की गई। अदालत ने कहा कि अखबारों में तस्वीरें छपने के बाद कराई गई पहचान परेड और अदालत में पहचान का कोई मतलब नहीं रह जाता। कई पुलिसकर्मियों ने यह भी बताया कि एसपी ने उन पर दबाव बनाया था कि आरोपितों की पहचान करके ही उनका निलंबन खत्म किया जाएगा।
सुशील श्रीवास्तव के बेटे अविक श्रीवास्तव और दीपक कुमार राव की गवाही को भी अदालत ने अविश्वसनीय करार दिया। अविक श्रीवास्तव ने घटना के तीन महीने बाद तीन सितंबर 2015 को केस दर्ज कराया, जबकि उनके भाई अमन श्रीवास्तव ने दो जून को ही मेडिका अस्पताल रांची में एक बयान दर्ज कराया था, जिसमें विकास तिवारी या किसी अन्य आरोपित का नाम नहीं था। दीपक कुमार राव ने खुद स्वीकार किया कि जब वह घटनास्थल पर पहुंचे, तब तक वारदात हो चुकी थी और पुलिस भी पहुंच चुकी थी।
साजिश के आरोप पर अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि सभी आरोपितों के बीच कोई स्पष्ट सहमति या समझौता था। राहुल देव पांडेय के खिलाफ यह आरोप लगाया गया कि उसने विकास तिवारी से मोबाइल पर बात की थी, लेकिन न तो कोई मोबाइल बरामद किया गया और न ही सीडीआर (काल डिटेल रिकार्ड) पेश किया गया। राहुल देव पांडेय घटना के दिन जेल में बंद था, जो जेल रजिस्टर से प्रमाणित हो गया।अदालत ने यह भी कहा कि विशाल सिंह और दिलीप साव जैसे आरोपितों को टीआइ परेड (पहचान परेड) में नहीं रखा गया और तीन साल बाद अदालत में पहली बार की गई पहचान कानून की दृष्टि से मान्य नहीं ठहराई जा सकती।

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पुलिस की जांच में लापरवाही
हाई कोर्ट ने कहा कि यह घटना न्याय की पवित्र संस्था पर एक गंभीर आघात थी, लेकिन इसे सुलझाने के लिए जिस तरह से जांच की गई और सबूत पेश किए गए, वह बेहद खराब और लापरवाही भरा था। गवाहों के बयानों में विरोधाभास, देरी से बयान दर्ज करना, अहम सबूतों (जैसे अमन श्रीवास्तव का बयान) को दबाना और पुलिस पर पहचान के लिए दबाव बनाने जैसी बातों ने अभियोजन के मामले को कमजोर कर दिया।

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