रांचीः झारखंड हाई कोर्ट ने बिहार स्टेट कोऑपरेटिव मार्केटिंग यूनियन लिमिटेड (बिस्कोमान) के चुनाव में झारखंड सरकार के नामित सदस्य को भाग लेने से रोके जाने के मामले पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह विवाद संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट की मूल अधिकारिता में आता है, क्योंकि इसमें दो राज्यों (बिहार और झारखंड) के बीच कानूनी अधिकारों का विवाद शामिल है।
बिहार में प्रशासनिक फेरबदल, कई IAS अधिकारियों के विभाग बदले गए
विस्कोमान एक बहु-राज्य सहकारी समिति, जिसमें बिहार और झारखंड दोनों राज्यों की हिस्सेदारी है। इसके एक बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में झारखंड सरकार ने अपने एक प्रतिनिधि (नामित सदस्य) को शामिल करने का दावा किया था। लेकिन बिहार सरकार ने तीन अप्रैल 2025 के एक अधिसूचना में कहा कि झारखंड के पास विस्कोमान में कोई इक्विटी शेयर नहीं है, इसलिए उसे नामित सदस्य भेजने का अधिकार नहीं है। इसके बाद केंद्रीय सहकारी चुनाव प्राधिकरण ने पांच मई 2025 के पत्र में झारखंड के नामित सदस्य को चुनाव प्रक्रिया से बाहर कर दिया।
JDU पार्टी ऑफिस में लगी पहली बार PM की तस्वीर, नीतीश के साथ मोदी के पोस्टर पर सियासत तेज
झारखंड सरकार ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इन निर्णयों को चुनौती दी और अपने नामित सदस्य को चुनाव में भाग लेने की अनुमति मांगी। जस्टिस आर मुखोपाध्याय और जस्टिस अंबुज नाथ की पीठ ने कहा कि यह मामला दो राज्यों के बीच कानूनी अधिकारों के विवाद से जुड़ा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ही सुन सकता है। कोर्ट ने झारखंड सरकार को उचित फोरम में जाने की अनुमति देते हुए याचिका खारिज कर दी। झारखंड सरकार अब सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। अदालत ने विस्कोमान के चुनाव प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं लगाई गई है। विस्कोमान की स्थापना 1958 में हुई थी और बिहार के विभाजन के बाद यह बहु-राज्य सहकारी समिति बन गई। झारखंड का दावा है कि बिहार विभाजन के बाद उसे विस्कोमान में हिस्सेदारी का अधिकार है, जबकि बिहार इसे खारिज कर रहा है।




