रांचीः झारखंड में नगर निकाय चुनाव में बीजेपी के समर्थित प्रत्याशियों के खिलाफ बागी के मैदान में उतरने से पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ। चुनाव परिणाम आने के बाद बीजेपी अब उन बागियों के खिलाफ नरम रुख अपना रही है। कई जगहों पर बागी प्रत्याशियों के जीतने के बाद संबंधित जिलाध्यक्षों ने उन्हें माला पहनाकर स्वागत किया। प्रदेश महामंत्री प्रदीप वर्मा ने भी सोशल मीडिया पर ऐसे विजयी प्रत्याशियों को बधाई दी। धनबाद में मेयर पद चुनाव जीते संजीव सिंह को बधाई देने धनबाद से बीजेपी विधायक राज सिन्हा पहुंचे और संजीव सिंह के हाथों उन्होंने खुद मिठाई खाई और बधाई दी। इसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई।
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इन घटनाक्रमों से संकेत मिल रहे हैं कि बीजेपी इस प्रकरण को अब समाप्त करने की तैयारी में है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि क्षमादान सिर्फ जीतने वाले प्रत्याशियों तक सीमित रहेगा या उन सभी नेताओं को राहत मिलेगी जिन्हें पार्टी ने शो-कॉज नोटिस जारी किया था। इस मुद्दे पर आधिकारिक तौर पर कोई भी पदाधिकारी बोलने से बचते नजर आ रहे है। लेकिन संगठन के भीतर मंथन जारी है। चर्चा है कि अब बीती ताहि बिसरिए की तर्ज पर आगे बढ़ने की तैयारी है।
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प्रदेश महामंत्री प्रदीप वर्मा ने गिरिडीह के कामेश्वर पासवान, धनबाद के संजीव सिंह, लोहरदगा के लक्ष्मीनारायण भगत, धनबाद के भृगुनाथ भगत, गुमला के हीरा साह, धनबाद के मुकेश पंडित, गुमला की फुलसुंदरी देवी, गढ़वा के अलख नाथ पांडेय, चाईबासा के अनूप सुल्तानिया, मेदिनीनगर के परशुराम ओझा, पाकुड़ की सबरी माला, मेदिनीनगर के राकेश सिंह, जामताड़ा के तरुण गुप्ता, जमशेदपुर के राजकुमार श्रीवास्तव, मिहिजाम की नीना शर्मा, चास की परिंदा सिंह, चिरकुंडा की सुनीता साव, चास की ऋतु रानी सिंह और धनबाद के अनिल यादव समेत अन्य नेताओं को शो-कॉज नोटिस जारी किया था। नोटिस में कहा गया था कि वे पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हैं, जो अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है। सात दिन में स्पष्टीकरण देने को कहा गया था। अन्यथा, अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी। इन नेताओं ने या तो बीजेपी समर्थित प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ा या अपने परिजन को मैदान में उतारा था।
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नगर निगम के मेयर पद पर भी बागियों की जीत ने पार्टी की रणनीति पर सवाल खड़े किए। हजारीबाग में अरविंद राणा और धनबाद में संजीव सिंह ने बीजेपी समर्थित उम्मीदवारों को बड़े अंतर से पीछे छोड़ते हुए जीत दर्ज की। इन दोनों जगहों पर पार्टी प्रत्याशी शुरू से अंत तक मुकाबले में प्रभावी नहीं रहे। देवघर में बीजेपी समर्थित रीता चौरसिया को हराने में पार्टी के बागी कार्यकर्ता बाबा बलियासे की अहम भूमिका मानी जा रही है। पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि बलियासे को ही समर्थ दिया जाना चाहिए था। इसी तरह पाकुड़ में सबरी पाल के नाम पर पहले समर्थन देने की सहमति बनी थी, लेकिन बाद में उन्हें दरकिनार कर दिया गया। अंततः जीत सबरी पाल की ही हुई। जामताड़ा में तरुण गुप्ता भी अपनी पत्नी को जिताने में सफल रहे।
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बीजेपी नेताओं ने माना है कि कुछ स्थानों पर प्रत्याशियों को समर्थन देने में चूक हुई। कार्यकर्ताओं की राय की अनदेखी करना महंगा पड़ा। पार्टी के मेयर प्रत्याशियों को समर्थन देने चाहिए था और नगर परिषद व नगर पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव से दूरी रखनी चाहिए थी। फिलहाल पार्टी के सामने चुनौती संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की है। अब संकेत है कि आगे की रणनीति पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।




