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शिबू सोरेन की पोती रख रही है दादी का ख्याल, जयश्री, राजश्री, विजयश्री ने संभाला रसोई का जिम्मा

शिबू सोरेन की पोती रख रही है दादी का ख्याल, जयश्री, राजश्री, विजयश्री ने संभाला रसोई का जिम्मा

रांचीः राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का परिवार इन दिनों गमगीन हैं। दिशोम गुरु के जाने के बाद पूरा परिवार इन दिनों रामगढ़ के नेमरा गांव में है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, उनके छोटे भाई बसंत सोरेन और भाभी सीता सोरेन परिवार के साथ नेमरा स्थित पैतृक घर में ही रह रहे है। इसी बीच गुरुजी के घर से एक अच्छी तस्वीर निकलकर सामने आई है।

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परिवार में एकजुटता की सुकून देने वाली तस्वीर सीता सोरेन की बेटी विजयश्री सोरेन ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शेयर किया है। इन तस्वीरों के माध्यम से परिवार की एकजुटता के साथ साथ ये भी जताने की कोशिश की गई है कि शिबू सोरेन की पोती ने रसोई का ही जिम्मा नहीं संभाला है बल्कि वो अपनी दादी रूपी सोरेन का भी ख्याल रख रही है।

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एक साल से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है जब सोरेन परिवार की बड़ी बहू सीता सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गई। दिशोम गुरू के केंद्रीय अध्यक्ष रहने के दौरान ही बड़ी बहू ने अपने पति और ससुर की मेहनत ने खड़ी की हुई पार्टी जेएमएम को छोड़ दिया था। बीजेपी ने उन्हे पहले लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया लेकिन वो दोनों चुनाव हार गई। राजनीतिक रूप से हासिये पर खड़ी सीता सोरेन अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर संकट के दौर से गुजर रही है। हालांकि परिवार के रूप में अब भी एकजुटता दिखाने की कोशिश की जा रही है।

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विधानसभा चुनाव में सीता सोरेन की बेटियों की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार पर जरूर कड़े बयान दिये गए लेकिन कभी की हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने सीता सोरेन और उनकी बेटियों को लेकर तल्ख बयान नहीं दिया। गुरुजी के निधन के बाद पूरा सोरेन परिवार एक छत के नीचे है। इस दौरान सीता सोरेन की बेटियां अपनी दादी का पूरा ख्याल रख रही है। विजयश्री सोरेन ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट एक्स पर इसको लेकर पोस्ट करते हुए लिखा कि हम सब ने मिलकर उसी मिट्टी के चूल्हे पर दादी माँ के लिए रात का खाना बनाया, जिस पर कभी परदादी माँ और दादी माँ ने अपने हाथों से बाबा और पूरे परिवार के लिए खाना पकाया था। 🤍
इस रसोई में पकते हर कौर में, सिर्फ भोजन ही नहीं…बल्कि उस संघर्ष का साहस और परिवार का त्याग भी मिला होता था।
वो भी तब, जब बाबा पुलिस की नज़रों से बचते-बचाते, जंगलों-पहाड़ों से लेकर गाँव की पगडंडियों तक, आंदोलन का बिगुल बजा रहे थे। महाजनों के अत्याचारों को ललकारते हुए, उन्होंने आदिवासी अधिकारों की लड़ाई का शंखनाद किया…एक ऐसी क्रांति की नींव रखी, जो पीढ़ियों तक गगूंजती रहेगी ।
चूल्हे की धीमी आँच में गाजर, भिंडी और यादें एक साथ पक रही थीं…हमने दादी माँ के लिए सादा सा खाना बनाया, पर उसमें अपना सारा प्यार, बाबा की यादें और उनकी क्रांति की कहानियाँ मिला दीं।
ऐसा महसूस हुआ, मानो इस चूल्हे की आँच ने हमें फिर से चार पीढ़ियों की गर्माहट, साहस और विरासत से जोड़ दिया हो…जहाँ एक ही साथ पक रहा था..अपनापन, संघर्ष की कहानी और यादों का स्वाद।

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