नई दिल्ली: राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर लगे आरोपों का खुलासा करते हुए खुलासा किया है कि किस तरह वोटर्स लिस्ट में गड़बडडी है । उन्होंने कहा कि हजारों लोगों के नाम फेक ऐड्रैस पर दर्ज, हजारों वोटर्स ने कई राज्यों में वोटिंग की । राहुल गांधी ने कर्नाटक के माधवपुरा विधानसभा सीट के सर्वे का खुलासा करते हुए कहा कि दावा किया कि 1,00,250 फर्जी वोटरों की पहचान की गई है। उन्होंने इसे “वोट चोरी” करार देते हुए कहा कि लोकतंत्र की नींव को कमजोर करने की साजिश रची गई है।
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— Rajesh Ram (@rajeshkrinc) August 7, 2025
राहुल गांधी ने मंच से एक बड़ी स्क्रीन पर 5 प्रकार की कथित “वोट चोरी” की जानकारी सार्वजनिक की। आंकड़ों के मुताबिक, माधवपुरा के इन फर्जी वोटों की सूची में शामिल हैं:
- डुप्लीकेट वोटर्स: 11,965
- फर्जी और अमान्य पते: 40,009
- एक ही पते पर बड़ी संख्या में वोटर: 10,452
- अवैध फोटो: 4,132
- फॉर्म 6 का दुरुपयोग: 33,692
राहुल गांधी ने इस खुलासे को लेकर कहा, “यह सिर्फ चुनावी आंकड़ों की हेराफेरी नहीं है, यह लोकतंत्र पर सीधा हमला है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठते हैं।“
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी टीम ने इन आंकड़ों को सत्यापित किया है और इसके पीछे एक “सुनियोजित रणनीति” है ताकि लोकतंत्र को कमजोर किया जा सके।
“मैंने कहा — ये इक्कीसवीं सदी है। आप एक हार्ड ड्राइव में सौ साल, दो सौ साल का पूरा डेटा स्टोर कर सकते हैं।
फिर भी आज, इस दौर में — सीसीटीवी ‘खराब’ हो जाता है, वॉटरलेस डेटा नहीं दिया जाता, कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता।
तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि चुनाव आयोग भाजपा के साथ मिलीभगत कर रहा है?
अब जब वो लॉग (डाटा लॉग) और रिकॉर्ड खत्म हो गए, तो क्या आप अपनी मर्जी से जो मन में आए, वही रिपोर्ट बना लेंगे? जब बार कोड, लॉग्स, ट्रैकिंग सब खत्म कर दिए गए, तो आपकी पारदर्शिता कहाँ है?”
राहुल गांधी ने कहा कि –
“अब चुनाव आयोग हमें इलेक्ट्रॉनिक वोटर डेटा नहीं दे रहा — न सिर्फ इस चुनाव का, बल्कि पिछले 10–15 सालों का भी नहीं। अगर वो हमें सीसीटीवी फुटेज भी नहीं देते, तो इसका मतलब साफ है कि वे अपराध में भागीदार हैं।
अब अगर चुनाव आयोग इस अपराध में भागीदार नहीं है — तो मुझे पूरा विश्वास है कि वे हैं। डेटा खुद यही बता रहा है।
उन्हें हमें इलेक्ट्रॉनिक वोटर लिस्ट देनी चाहिए। कृपया वो कागज़ों का ढेर दिखाइए। छह महीने लग गए हमें यह करने में। क्योंकि वे हमें डेटा इस तरीके से देते हैं — बिखरा हुआ, अप्रासंगिक, जांच न किए जा सकने वाला।
हम महाराष्ट्र से लगातार कह रहे हैं — पिछले 10 साल की इलेक्ट्रॉनिक वोटर लिस्ट हमें दीजिए। हमें देखना है, जांच करनी है, समझना है।
मुझे लगता है कि अब न्यायपालिका को इसमें दखल देना चाहिए। हमें समझने की ज़रूरत है कि वास्तव में हो क्या रहा है, क्योंकि जिस लोकतंत्र को हम इतना प्यार करते हैं — वो अब अस्तित्व में ही नहीं है।“





