..जब लालू यादव ने BJP के सहयोग से बिहार में बनाई सरकार, अर्श से फर्श पर आई कांग्रेस

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दसवीं विधानसभा में बिहार की राजनीति ने नयी करवट ली। इसके बाद राज्य में नये राजनीतिक समीकरण बने। इसने कांग्रेस की न केवल सत्ता से विदाई कर दी, बल्कि उसे राजनीतिक हाशिये पर ला दिया। महज एक चुनाव पहले प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने वाली कांग्रेस को इस चुनाव में भारी झटका लगा। वह एकदम से अर्श से फर्श पर पहुंच गयी। पिछले चुनाव में उसने 196 सीटें जीती थी, लेकिन इस बार उसकी 125 सीटें घट गयी और वह सीधे 71 पर पहुंच गयी।

इस चुनाव में वीपी सिंह की लहर थी। 1989 में केंद्र में वीपी सरकार के गठन का कारण भी यही लहर थी। बिहार में भी वीपी लहर पर सवार होकर जनता दल ने शानदार जीत हासिल की। यह लहर पिछले चुनाव के राजीव लहर पर भारी पड़ी। इसी का परिणाम हुआ कि कांग्रेस की विदाई हो गयी। जनता दल के रूप में फिर से नया विकल्प सामने आया। इसने सहयोगी दलों के सहयोग से मिलकर बहुमत प्राप्त की, बल्कि पांच साल चलने वाली सरकार भी बनायी। जनता दल ने 122 सीटें जीतीं।

जनता दल के नेता के रूप में लालू प्रसाद यादव ने भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी पार्टी के सहयोग से गैर कांग्रेसी सरकार बनायी। उन्होंने बगैर किसी विरोध के पूरे पांच साल सरकार चलायी। जगन्नाथ मिश्रा विपक्ष के नेता बने। वे पिछली बार मुख्यमंत्री थे। जबकि, मुख्यमंत्री बने लालू प्रसाद पिछली सरकार में विपक्ष के नेता रहे थे।

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जनता दल के रूप में राज्य में नयी ताकत का उदय हुआ। उसे वोट और सीट दोनों ही मामले में कांग्रेस को मात दी। इसे कांग्रेस से महज एक फीसदी अधिक वोट मिले, लेकिन सीटें 51 अधिक मिल गयीं। महज दूसरे चुनाव में ही राजीव गांधी का जादू गायब हो गया। कांग्रेस की ऐसी फजीहत आजादी के बाद दूसरी बार हुई। इसके पहले 1977 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका लगा था। तब आपातकाल ने कांग्रेस की हवा निकाल दी थी।

आपातकाल लगाने के तत्काल बाद 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस को केवल 57 सीटें मिली थी और 23.6 फीसदी वोट आए थे। इस बार कांग्रेस को केवल 71 सीटें मिली, पिछली बार से उसी सीटों की संख्या 125 कम हो गयी। इस चुनाव में उसे मात्र 24.78 फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा। कांग्रेस पर यह चुनाव काफी भारी पड़ा। इसके बाद वह कभी ढंग से उठ नहीं पायी। उधर, भारतीय जनता पार्टी ने अपनी ताकत में और इजाफा किया। वह अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी सीपीआई से काफी आगे निकल गयी।

जहां सीपीआई को 23 सीटें मिली, वहीं भाजपा ने 39 सीटें जीती। जनता दल और कांग्रेस के बाद उसने सर्वाधिक सीटें जीती। एक नयी शक्ति के रूप में झारखंड मुक्ति मोर्चा भी सामने आया और दक्षिण बिहार (अब का झारखंड) में उसने अपनी दमदार उपस्थिति दिखलायी। उसने 19 सीटें जीत ली। एक दिलचस्प बात यह थी कि इस चुनाव में केवल भारतीय जनता पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के ही वोट बढ़े, अन्य दलों के वोट प्रतिशत में कमी आई।

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जगन्नाथ मिश्र, गुलाम सरवर, पूर्णमासी राम, चंद्र मोहन राय, भोला राम तूफानी, मदन प्रसाद जायसवाल, ब्रज बिहारी प्रसाद, अवध बिहारी चौधरी, गोरख राम, उदित राय, चंद्रिका राय, तुलसीदास मेहता, वृष्ण पटेल, रघुनाथ पांडेय, रमई राम, रघुनाथ झा, गौरीशंकर नागदंश, शकील अहमद, विलट पासवान विहंगम, देव नारायण यादव, जगन्नाथ मिश्र, गुलाम सरवर, विजय कुमार मिश्र, पितांबर पासवान, शंकर प्रसाद टेकरीवाल, राजकुमार महासेठ, कुमुद रंजन झा प्रमुख थे। जीत दर्ज कराने वाली महिलाओं में निर्मला सिंह, वीणावादिनी देवी, शांति देवी, सुशीला हासंदा, सुधा श्रीवास्तव प्रमुख थीं।

… और लालू प्रसाद की जीत हो गई पक्की

इस चुनाव के बाद आए परिणाम के बाद भी सरकार बनाने को खूब खेला हुआ। गैर कांग्रेसी अन्य दलों के सहयोग से जनता दल की सरकार बननी तो तय हो गयी, लेकिन नेता को लेकर पेच फंसा हुआ था। एक ओर लालू प्रसाद ताल ठोक रहे थे तो दूसरी ओर पार्टी का बड़ा वर्ग रामसुंदर दास को सीएम बनाना चाह रहा था। पूर्व मंत्री शिवानंद तिवारी कहते हैं कि पार्टी चाहती थी कि रामसुंदर दास सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री बनें। लेकिन शरद यादव ने चुनाव कराने की शर्त रखी। उन्होंने इसके लिए दबाव डाला।

उनके साथ कई और लोग खड़े हो गए। बात बनती न देख, दोनों के बीच विधायकों से चुनाव कराने का निर्णय लिया गया। चुनाव हुए। इसमें बदली राजनीतिक परिस्थितियों में लालू प्रसाद ने जीत हासिल की। माना जा रहा था कि लालू प्रसाद को उप प्रधानमंत्री देवीलाल का समर्थन प्राप्त था। उधर, रामसुंदर दास को वीपी सिंह का करीबी माना जा रहा था।

बताया जाता है कि रामसुंदर दास की बढ़त को देखते हुए चन्द्रशेखर से बिहार में रघुनाथ झा को भी प्रत्याशी बनाने का अनुरोध किया गया। अंत में इन तीनों के बीच हुए चुनाव में लालू ने कांटे की टक्कर में रामसुंदर दास को पराजित कर सीएम की कुर्सी प्राप्त की। रघुनाथ झा को लालू प्रसाद की जीत में मददगार माना गया। उनके द्वारा काटे गए वोट ने लालू प्रसाद की जीत पक्की कर दी।

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