बीवी-बच्चे के खर्च से बचने के लिए खुद को बताया बेरोजगार, RTI में सच सामने आया तो कोर्ट भी हैरान

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July 2, 2025

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झारखंड से हैरान करने वाला मामला सामने आया है जिसमें एक शख्स ने एलिमनी और बच्चे के खर्च से बचने के लिए खुद को बेरोजगार बता दिया। लेकिन एक आरटीआई में जब सच सामने आया तो सभी के होश उड़ गए। दरअसल एक महिला ने रांची की फैमिली कोर्ट में पति पर मानसिक प्रताड़ना और दहेज की मांग का आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी दाखिल की थी। तब फैमिली कोर्ट ने पति को एकमुश्त 12 लाख रुपये और बच्चे के भरण-पोषण के लिए हर महीने 8,000 रुपये देने का आदेश दिया था। इस दौरान पति ने दावा किया था कि वह बेरोजगार है।

इसके बाद महिला ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी और पति के बेरोजगारी वाले दावे का सच सामने लाने के लिए एक आरटीआई फाइल की। आरटीआई में पता चला कि उसकी सालाना आय 27 लाख रुपए जिससे खुद कोर्ट भी हैरान रह गया। इसके बाद हाई कोर्ट ने शख्स को हर महीने कुल 90,000 रुपये भरण-पोषण के रूप में देने का निर्देश दिया है। इसमें 50,000 रुपये अपनी पूर्व पत्नी को और 40,000 रुपये अपने ऑटिस्टिक बेटे के लिए बच्चे की देखभाल के लिए दिए जाएंगे।

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महिला की कानूनी टीम ने आयकर विभाग से मिले आरटीआई जवाब कोर्ट में पेश किया था। इसमें बताया गया था कि महिला का पति मुंबई में एक आईटी फर्म में काम करता है और कटौती के बाद उसे हर महीने 2.3 लाख रुपये मिलते हैं। इस पर हाई कोर्ट ने ये कहते हुए फैमिली कोर्ट की कि उसने बिना किसी वेरिफिकेशन के पति के बेरोजगारी के दावे वाले एफिडेविट को स्वीकार कर लिया।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस राजेश कुमार की पीठ ने शख्स द्वारा अपने बेटे को छोड़ देने को न केवल नैतिक विफलता बल्कि कानूनी चूक बताया। कोर्ट ने कहा 75 फीसदी बौद्धिक विकलांगता वाले बच्चे को लॉन्गटर्म केयर की जरूरत होती है। महिला गेस्ट टीचर के तौर पर काम करती है और अपने ऑटिस्टिक बच्चे की देखभाल भी करती है। ऐसे में कोर्ट ने महिला के दोहरे बोझ को मानते हुए थेरेपी, विशेष शिक्षा और हेल्थकेयर के लिए हर महीने लगने वाले 53 हजार रुपए के प्रस्तुत अनुमान को स्वीकार किया।

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