जमशेदपुर: 8 अगस्त, 1987 को राखी का त्योहार था। 11:45 बजे दिन का समय, टाटा स्टील कम्पनी का चमररिया गेस्ट हाउस, वाहन पर सवार हथियारों की लैस हमलावर आते हैं और गेस्ट हाउस के बाहर बरामदे में अचानक ठाँय, ठाँय, ठाँय गोलियों की आवाज गूँज उठती है। उस समय निर्मल महतो चमररिया गेस्ट हाउस से बाहर निकल रहे थे। बाहर निकलते ही उन पर गोलियों की बौछार होती है, वे गेस्ट हाउस की सीढ़ियों के निकट गिर पड़ते हैं। उनके साथ ही झारखंड का प्रिय नेता निर्मल महतो शहीद हो गया। हमलावर अपना काम तमाम कर वहाँ से फरार हो जाते हैं। इसके साथ ही यह खबर झारखंड में बिजली की तरह फैल गयी कि निर्मल महतो की काँग्रेस नेता वीरेन्द्र सिंह ने हत्या कर दी है। यह सुनते ही पूरा झारखंड रो पड़ा, हजारों परिवारों ने उस दिन राखी का त्योहार नहीं मनाया। लोग शोकाकुल थे।
श्राद्ध में जा रहे थे निर्मल महतो
झामुमी के अध्यक्ष निर्मल महतो, विधायक सूरज मंडल, काँग्रेस नेता एवं पूर्व विधायक ज्ञानरंजन, बाबूलाल सोय, शिवाजी राय, ये सभी कार द्वारा 7 अगस्त, 1987 की रात्रि लगभग साढ़े दस बजे राँची से जमशेदपुर पहुँचे थे और टाटा स्टील के चमररिया गेस्ट हाउस में थे। उनसे दूसरे दिन कांग्रेस नेता अवतार सिंह तारी के घर उनकी माँ के श्राद्धकर्म में भाग लेने के लिए जाना था। दिन के लगभग पौने बारह बजे सभी श्राद्ध में भाग लेने के लिए गेस्ट हाउस से निकले। उन लोगों के साथ में स्केप व्यवसायी शंकर सिंह, सुनील सिंह समेत कई अन्य लोग भी थे।
एंबेसडर कार से आए थे हत्यारे
चमररिया गेस्ट हाउस के सामने निर्मल भट्टाचार्य जीप लेकर खड़ा था, जिस जीप में निर्मल महतो को अवतार सिंह तारी के घर जाना था। निर्मल महतो, विधायक सूरज मंडल एवं कई अन्य लोग गेस्ट हाउस से निकलकर ज्यों ही गेट पर पहुँचे, सामने सड़क पर खड़ी एक कार की बगल में खड़े दो युवक आगे निकले, गेस्ट हाउस से निकल रहे नेताओं की पीठ से वीरेन्द्र सिंह ने निर्मल महतो को निशाना बना कर गोली चलाई। गोली निर्मल महतो की लगी और वे वहीं गिर पड़े। एक गोली सूरज मंडल की ऊँगली को चीरकर निकल गयी। हमलावरों को रोकने के लिए सुनील सिंह ने अपने लाइसेंसी रिवॉल्वर से हवाई फायर किया, तब तक हमलावर फरार हो गया। घायल निर्मल महतो एवं सूरज मंडल को निधि भट्टाचार्य ने जीप से टाटा मेन अस्पताल पहुँचाया जहाँ चिकित्सकों ने निर्मल महतो की मौत घोषित कर दिया।
सूरज मंडल की गवाही अहम थी
घटना के बाद जमशेदपुर के बिष्टुपुर थाना में एक प्राथमिकी 8 अगस्त, 1987 को दर्ज की गई। यह आईपीसी की धारा 302, 307, 34 और आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत वीरेन्द्र सिंह, पप्प और अखिलेश्वर सिंह वगैरह के खिलाफ दर्ज की गई। यह प्राथमिकी झारखंड मुक्ति मोर्चा के बिहार प्रभारी विधायक श्री सूरज मंडल के फर्द बयान के आधार पर दर्ज की गई। बाद में बिहार सरकार ने इस हत्याकांड की जाँच स्थानीय पुलिस के हाथों से लेकर सीबीआई को दे दी। लंबे समय तक मामला जमशेदपुर की सीबीआई अदालत में चला। सूरज मंडल और निर्मल भट्टाचार्य की गवाही के बाद वीरेन्द्र सिंह सहित सभी अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
निर्मल महतो ने झारखंडियों को एक किया
झामुमो के नेता और आम जनता को झारखंड आंदोलन का मतलब सिर्फ आदिवासियों का आंदोलन समझते थे और झारखंड नाम से बचते थे। कुछ व्यावसायिक कारणों और निजी स्वार्थों वाले लोग ने आदिवासी, गैर-आदिवासी भावना को उजागर कर दिया थी। उन्होंने तरह-तरह प्रकार से आंदोलन में झारखंड में सिद्ध लोगों के हितों को होने के इस बात से लगाये रखा था, लेकिन निर्मल महतो को शहादत ने हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई धर्मों को झारखंड आंदोलन का मार्ग दिखा दिया।
शिबू सोरने ने निर्मल महतो का राह थामी
शहीद निर्मल महतो जनता को विश्वास संदेश ये किसी सामान्य की, इसका दुश्मन 22 सितंबर, 1987 को जमशेदपुर गोल मैदान में झामुमो की जनसभा में मिला। उस दिन की विशाल जनसमूह ने सिर्फ यह कहा, जाति से लोग नहीं बल्कि झारखंड क्षेत्र में रहने वाली सभी झारखंडवासियों की थी। यह भीड़ जमशेदपुर के इतिहास में पिछली कभी सामने से नहीं थी। उस सभा में झामुमो के नेता शिबू सोरेन एवं पार्टी के अन्य बड़े नेताओं ने झामुमो के पूर्व अध्यक्ष शहीद निर्मल महतो की शक्ति पर चलने की घोषणा थी।
निर्मल महतो की शहादत ने झारखंड आंदोलन में एक सुसंस्कारित परिवर्तन ला दिया। झारखंड राज्य को अपनी जाति और ‘शहीद निर्मल महतो अमर रहे, जय झारखंड-जय भारत’ के नारों के साथ एक बार फिर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने की झारखंड क्षेत्र को परिक्रमा की। निर्मल महतो के संदेश के रूप में लोगों को झारखंड आंदोलन की दिशा और लक्ष्य दिखायी गयी। इसका नतीजा यह हुआ कि झारखंड का नाम लेकर राष्ट्रीयता को झारखंड विरोधी राजनीति करने वाले लोगों को झारखंड को जनता ने नकार दिया। उसका सारा राजनीतिक धारा, sway साहित्य नष्ट हो गया। झारखंड की आर्थिक उपलब्धि साधना सोपानकारी शोषितों का हश्र यह सभी और झारखंड मुक्ति मोर्चा जनता में लोकतंत्र बन गया था।
झामुमो के बड़े नेताओं की जनसभाओं ने तो राष्ट्रीय नेताओं के टक्कर की भीड़ उमड़ायी थी। यही तो शहादतों थी। जनसभा में यह आंदोलन का प्रतिपादन झारखंड की जनता में दिख रहा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के विहीन अनुशासन और शिक्षा मुल्लकों को छीन कर, कलकत्ता और पटना तक को दौड़ने लगी। दक्षिण और गुटों में दूसरे जगहों पर शरण खोज गुज़रे।







