मिल गया 114 साल के फौजा सिंह का एनआरआई कातिल, फॉर्च्यूनर भी जब्त; सड़क पर मारी थी टक्कर

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डेस्कः दुनिया भर में टर्बनड टॉर्नेडो के नाम से मशहूर एथलीट फौजा सिंह को गाड़ी से टक्कर मारने वाले को जालंधर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी की पहचान 30 वर्षीय एनआरआई अमृतपाल सिंह ढिल्लों के रूप में हुई है जो करतारपुर के दासूपुर गांव का रहने वाला है। पुलिस उसे आज कोर्ट में पेश करेगी। पुलिस ने उसकी फॉर्च्यूनर गाड़ी पीबी 20 सी 7100 को भी जब्त कर लिया है। पूछताछ में अमृतपाल ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है।

फौजा सिंह की सैर करते हुए सीसीटीवी फुटेज सामने आई थी, जिसमें वह गांव से अकेले ही नेशनल हाईवे की ओर सैर करने के लिए जाते दिख रहे थे। इसी दौरान एक तेज रफ्तार टक्कर मारने वाली फॉर्च्यूनर गाड़ी चालक उन्हें टक्कर मार कर फरार हो जाता है। फौजा सिंह को तुरंत उनके परिजन जालंधर के एक निजी अस्पताल ले जाते हैं, जहां उनकी मौत हो जाती है।

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घटना के बाद थाना आदमपुर में इस मामले में एफआईआर दर्ज की गई और पुलिस ने आसपास की सीसीटीवी फुटेज चेक की तो फॉर्च्यूनर गाड़ी की पहचान हो गई। मौके से हेडलाइट के टुकड़े भी मिले। नंबर से पता चला कि उक्त गाड़ी कपूरथला के अठौली गांव के रहने वाले वरिंदर सिंह के नाम पर रजिस्टर थी। जालंधर पुलिस की टीमें कपूरथला रवाना हुईं और वरिंदर तक पहुंचीं। वरिंदर सिंह से पूछताछ में पता चला कि कनाडा से आए एक एनआरआई अमृतपाल सिंह ढिल्लों ने उनकी कार खरीदी थी।

मंगलवार देर रात पुलिस ने अमृतपाल को गिरफ्तार किया और उसकी गाड़ी भी बरामद कर ली। आरोपी को पता ही नहीं था हादसे का शिकार होने वाले फौजा सिंह थे

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एनआरआई अमृतपाल सिंह ढिल्लों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया और कहा कि वह अपना फोन बेच कर लौट रहा था। जब वह ब्यास गांव के पास पहुंचा तो एक बुजुर्ग उनकी गाड़ी की चपेट में आया। उन्हें ये नहीं पता था कि बुजुर्ग फौजा सिंह हैं। हादसे के बाद अमृतपाल घबरा गया और हाईवे की बजाय गांवों की भीतरी सड़कों से होते हुए अपने गांव पहुंचा। अमृतपाल 8 दिन पहले ही कनाडा से लौटा था।

फौजा सिंह के छोटे बेटे हरविंदर सिंह ने कहा कि हम आरोपी खिलाफ कड़ी कार्रवाई चाहते हैं। आरोपी ने न सिर्फ लापरवाही से गाड़ी चला कर उनके पिता को टक्कर मारी बल्कि घायल को अस्पताल ले जाने की बजाय मौके से फरार भी हो गया। वहीं, फौजा सिंह के परिजनों ने बताया कि 114 साल की आयु में भी फिट थे। फौजा सिंह की अंतिम इच्छा थी कि वह अपनी जिंदगी के आखिरी पल अपने गांव में ही बिताना चाहते थे।

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