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दुमका में राजकीय जनजातीय हिजला महोत्सव की शुरूआत, अंधविश्वास की वजह से उद्घाटन में नहीं शामिल हुए कोई मंत्री और विधायक

दुमका में राजकीय जनजातीय हिजला महोत्सव की शुरूआत, अंधविश्वास की वजह से उद्घाटन में नहीं शामिल हुए कोई मंत्री और विधायक

दुमकाः संथाल परगना के प्रसिद्ध राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्स की शुरूआत शुक्रवार को बड़े धूमधाम से हुई। हिजला गांव के ग्राम प्रधान सुनीलाल हेम्ब्रम ने इस मेले का उद्घाटन किया। 135 साल पुराने इस मेले के उद्घाटन समारोह के दौरान दुमका के डीडीसी अभिजीत सिन्हा समेत कई अधिकारी मौजूद थे। इस मेले में आदिवासी समूदाय का बड़ा हुजूम उमड़ा और लोगों ने बड़े उत्साह के साथ मेले की शुरूआत की।

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03 फरवरी 1890 को जॉन रॉबर्ट कैसटर्स ने इस मेले की शुरूआत की थी। जानकारों के अनुसार इस मेले में ब्रिटिश प्रशासक मेले का आयोजन कर ग्राम प्रधान, मांझी के साथ स्थानीय लोगों के साथ विचार विमर्श करते थे। उस समय से अबतक ये मेला चल रहा है। 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इसे राजकीय मेला घोषित कर दिया था। हिजला मेला जनजातियों के साथ साथ अन्य सभी के लिए विशेष महत्व रखता है।

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पिछले 25-30 सालों से इस मेले को लेकर एक अंधविश्वास फैला हुआ है इस वजह से इस मेले के उद्घाटन में कोई मंत्री, विधायक, मुख्यमंत्री या कोई बड़ा अधिकारी नहीं जाता है। इस मेले के उद्घाटन को लेकर एक अंधविश्वास ये है कि इस मेले के उद्घाटन में जो भी जाता है उसकी सत्ता और कुर्सी चली जाती है। संयुक्त बिहार में लालू यादव, जगन्नाथ मिश्रा, भगवत झा आजाद इस मेले का उद्घाटन करते रहे है यहां तक की राज्यपाल ने भी इस मेले का उद्घाटन किया है। 1996 में जब लालू यादव चारा घोटाले में फंसे और उनकी कुर्सी चली गई उसके बाद से इस अंधविश्वास को और हवा मिल गई। उन्होन कुछ दिनों पहले ही हिजला मेले का उद्घाटन किया था। इसके बाद से जनप्रतिनिधि इस मेले के उद्घाटन और समापन में जाने से बचते रहे है। 2001 में बाबूलाल मरांडी ने इसे राजकीय मेला के रूप में मान्यता दी , इसके बाद बाबूलाल मुख्यमंत्री पद से हट गये और फिर कभी मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। इस मेले को लेकर अंधविश्वास यहां तक है कि कोई विधायक-सांसद भी इस मेले में नहीं जाते। शुक्रवार को उद्घाटन के दौरान कोई विधायक-सांसद मौजूद नहीं थे।

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