चाईबासाः सारंडा के जंगलों में माओवादी तो खात्मे के कगार पर हैं । उनके कैंप और बंकर ध्वस्त किए जा रहे हैं मगर उनके द्वारा बिझाए गए लैंडमाइन जान के लिए खतरा बने हुए हैं । खासतौर से जंगल के भरोसे जीवन यापन करने वाले । सांरडा के लोगों को जंगली जानवरों से ज्यादा खतरा लैंड माइन का रहता है । बलिबा गांव के शाहू बरजो के साथ ऐसा ही हुआ जब वो पत्ता चुनने गए तो एक पांव पर ही घर लौट सका । लैंड माइन ने उसके दूसरे पांव की बली ले ली ।
शाहू बरजो मई के महीने में जंगल गया था ताकि पत्ते तोड़ कर परिवार का पालन पोषण कर सके लेकिन जैसे ही नक्सलियों के बिझाए लैंड माइन पर पैर पड़ा उसका एक पैर जख्मी हो गया और उसे काटना पड़ा । शाहू बरजो अब दिन भर अपने घर में पड़ा रहता है , उसका इलाज भी सही ढंग से नहीं हो पाया जिसकी वजह से पूरा दिन कराहता रहता है । उसकी पत्नी ही मरहम पट्टी करती है ।
झारखंड में माओवादियों ने बूढ़ा पहाड़ से लेकर सारंडा के जंगलों तक सैकड़ो लैंड माइन बिझा रखे हैं । कभी कोई जानवर इसकी चपेट में आ जाता है तो कभी कोई इंसान । नक्सलियों केखात्मे के साथ-साथ अब सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है इस तरह के लैंड माइन को निष्क्रिय करना । घातक बात तो ये है कि इस तरह के लैंड माइन को अगर डिफ्यूज नहीं किया गया तो सौ साल से अधिक तक सक्रिय रह सकते हैं ।
वर्तमान में लगभग 60 देशों में 10 करोड़ एंटी-पर्सनल बारूदी सुरंगें दबी हुई हैं, जिनका उद्देश्य युद्ध में सैनिकों को घायल करना या मारना है। दुर्भाग्यवश, इनका शिकार अक्सर आम नागरिक बनते हैं। हर साल लगभग 25,000 लोग बारूदी सुरंग विस्फोटों में अपने अंग गंवा देते हैं; कई अपनी जान भी खो देते हैं।
साल 1991 में “इंटरनेशनल कैंपेन टू बैन लैंडमाइंस” (ICBL) की स्थापना इसी समस्या के समाधान के लिए की गई थी। इसका उद्देश्य था बारूदी सुरंगों पर प्रतिबंध लगवाना और विश्वभर की सरकारों को सुरंग हटाने (demining) के कार्य में वित्तीय सहायता देने के लिए प्रेरित करना। इस अभियान की स्थापना संयोजक जोडी विलियम्स (अमेरिका) थीं, जिन्हें इस संगठन के साथ मिलकर नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।




