JTET Language Controversy:पहली बैठक में नहीं निकला कोई हल, 5 मंत्रियों ने मांगा शिक्षा विभाग से आंकड़ा

JTET Language Controversy:पहली बैठक में नहीं निकला कोई हल, 5 मंत्रियों ने मांगा शिक्षा विभाग से आंकड़ा

रांचीः झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) में भाषा को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए गठित पांच मंत्रियों की विशेष कमेटी की पहली बैठक सोमवार को संपन्न हुई। बैठक में सभी सदस्यों ने अपने-अपने तर्क और तथ्यों के साथ पक्ष रखा, लेकिन किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका।बैठक में इस बात पर गहन मंथन हुआ कि आखिर किन प्रशासनिक आधारों पर शिक्षा विभाग ने इन भाषाओं को नई नियमावली से बाहर का रास्ता दिखाया? समिति ने सख्त रुख अपनाते हुए विभाग से संबंधित सभी तथ्यात्मक, प्रशासनिक और जनसांख्यिकीय डाटा तलब किया है, ताकि इस संवेदनशील विवाद के पीछे की प्रक्रिया और निर्णय का आधार पूरी तरह स्पष्ट हो सके।
शिक्षा विभाग से मांगा गया पूरा तथ्य और साक्ष्य
मंत्रियों की विशेष उच्चस्तरीय समिति ने साफ कर दिया है कि भाषा जैसे संवेदनशील मसले पर कोई भी निर्णय लोकलुभावन बयानों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सामाजिक और शैक्षणिक आंकड़ों के आधार पर लिया जाएगा। बैठक के बाद समिति के सदस्य और मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने मीडिया से बात करते हुए कहा, यह हमारी पहली परिचयात्मक और समीक्षा बैठक थी। इस बैठक में संबंधित पदाधिकारियों को सभी जरूरी तथ्य, प्रशासनिक साक्ष्य और जनसांख्यिकीय आंकड़े जुटाने का निर्देश दिया गया है। इन आंकड़ों के आने के बाद ही आगे की रणनीति और समाधान पर विचार किया जाएगा।
आगामी बैठक तक क्या-क्या उपलब्ध कराने का निर्देश
• भाषाई जनसंख्या: राज्य के विभिन्न जिलों और सीमावर्ती क्षेत्रों में भोजपुरी, मगही और अंगिका बोलने वाले लोगों की सटीक और प्रमाणिक संख्या कितनी है।
• पूर्व परीक्षाओं का ट्रैक रिकॉर्ड: पूर्व में आयोजित हुई जेटेट परीक्षाओं में इन भाषाओं को मुख्य विकल्प के रूप में चुनकर कितने अभ्यर्थी शामिल हुए थे और उनमें से कितनों का चयन हुआ।
• शैक्षणिक आवश्यकता: जिला स्तर पर प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में इन भाषाओं के माध्यम से पढ़ाई या शिक्षकों की उपलब्धता की वर्तमान स्थिति क्या है।
मंत्रियों की कमेटी के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
सीमावर्ती जिलों का भारी दबाव
बिहार की सीमा से सटे झारखंड के गढ़वा, पलामू, चतरा, कोडरमा, दुमका, गोड्डा, साहिबगंज और जामताड़ा जैसे जिलों में एक बहुत बड़ी आबादी दैनिक जीवन में भोजपुरी, मगही और अंगिका का उपयोग करती है। जेटेट नियमावली से इन भाषाओं को हटाए जाने के बाद से इन जिलों के स्थानीय युवाओं में रोजगार के अवसरों को खोने का गहरा आक्रोश है। समिति को इस आक्रोश को शांत करना ही होगा।
अस्मिता बनाम अधिकार की जंग
झारखंड की राजनीति का मूल ढांचा ‘मूलवासी बनाम बाहरी’ की बहस पर टिका है। एक तरफ राज्य के मूलवासियों की मांग है कि झारखंड की अपनी विशिष्ट क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं (जैसे नागपुरी, खोरठा, कुड़ुख, मुंडारी) को ही शत-प्रतिशत प्राथमिकता दी जाए, ताकि स्थानीयता बची रहे। दूसरी तरफ, सीमावर्ती जिलों में पीढ़ियों से रह रहे युवाओं के रोजगार के अधिकार का सवाल है। समिति के लिए इस संतुलन को साधना दोधारी तलवार पर चलने जैसा है।
आदिम जनजातियों की उपेक्षा पर गहराता सवाल
इस बैठक में केवल भोजपुरी-मगही का ही मुद्दा नहीं गूंजा, बल्कि आदिम जनजातीय भाषाओं की उपेक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए। विशेष रूप से असुर और बिरहोर जैसी विलुप्तप्राय आदिम जनजातियों की भाषाओं को नियमावली से हटाने के शिक्षा विभाग के फैसले पर मंत्रियों ने नाराजगी जताई। सदस्यों ने दोटूक कहा कि इन भाषाओं का सीधा संबंध राज्य की मूल सांस्कृतिक पहचान से है, इसलिए इनके संरक्षण और पात्रता परीक्षा में स्थान देने के लिए बेहद संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।
पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की का हस्तक्षेप
कांग्रेस की स्टेट पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी के वरिष्ठ सदस्य बंधु तिर्की ने एक बेहद महत्वपूर्ण और तकनीकी व्यावहारिक सुझाव देकर इस विवाद को नया मोड़ दे दिया है। पूर्व शिक्षा मंत्री रहे बंधु तिर्की ने वर्तमान ब्यूरोक्रेसी की कार्यशैली पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि राज्य के अधिकारियों ने बिना किसी जमीनी मेहनत के जेटेट की नई नियमावली बना दी, जिसने बेवजह राज्य में अशांति और विवाद को जन्म दे दिया.।जब मैं शिक्षा मंत्री था, तब मैंने राज्यभर के लब्धप्रतिष्ठित शिक्षाविदों, भाषाविदों और नीति निर्माताओं के साथ दर्जनों बैठकें करके झारखंड सरकार की संकल्प संख्या 1632 (दिनांक 01-04-2011) तैयार करवाई थी। इस संकल्प में राज्य के सभी 24 जिलों की भाषाई विविधता और हर क्षेत्र के अभ्यर्थियों के साथ न्याय करने का मुकम्मल फॉर्मूला पहले से ही मौजूद है।
मान्यता का विरोध, लेकिन रोजगार के अधिकार का समर्थन
बंधु तिर्की ने अपने उस पुराने स्टैंड को फिर से दोहराया कि भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका जैसी भाषाओं को झारखंड में राज्य स्तर पर आधिकारिक राजभाषा या क्षेत्रीय भाषा के रूप में सामान्य मान्यता नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने पड़ोसी राज्यों का उदाहरण देते हुए तार्किक सवाल उठाया कि बिहार के रोहतासगढ़ और आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर कुड़ुख (उरांव) भाषा बोली जाती है, लेकिन बिहार सरकार ने उसे वहां प्रतियोगी परीक्षाओं में कहां मान्यता दी है? बिहार के ही पूर्णिया, कटिहार और किशनगंज जैसे कई जिलों में संथाली बोली जाती है, लेकिन वहां उसे कोई स्थान नहीं मिला है। असम के चाय बागानों में लाखों की संख्या में संथाली और मुंडारी भाषी आबादी रहती है, लेकिन असम सरकार ने उन्हें वहां मान्यता नहीं दी। यहां तक कि भोजपुरी और अंगिका को खुद बिहार राज्य में भी आठवीं अनुसूची या पूर्ण आधिकारिक संरक्षण की वह स्थिति प्राप्त नहीं है, तो फिर झारखंड में इन्हें थोपने का सवाल ही नहीं उठता।
क्या है 2011 का जिला-स्तरीय फॉर्मूला?
बंधु तिर्की ने समिति से अपील की है कि वे 2011 के संकल्प संख्या 1632 का गहराई से अवलोकन करें। इस संकल्प के तहत प्रावधान है कि भले ही इन भाषाओं को राज्य स्तर पर मान्यता न हो, लेकिन जिला स्तर पर प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति और प्रतियोगिता परीक्षाओं में इन्हें संबंधित जिलों (जैसे पलामू में भोजपुरी, संथाल परगना के कुछ जिलों में अंगिका) के लिए वैकल्पिक विषय के रूप में रखा जाए। इससे राज्य की मुख्य भाषाई पहचान (05 जनजातीय और 04 क्षेत्रीय भाषाएं) भी सुरक्षित रहेगी और सीमावर्ती जिलों के युवाओं के साथ कोई अन्याय भी नहीं होगा।
हर 30 किलोमीटर पर बदलती है तासीर
बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां हर 30 से 40 किलोमीटर की दूरी पर भाषा, बोली और संस्कृति की तासीर बदल जाती है।
जिलेवार भाषाई समीकरण पर एक नजर
• रांची और मध्य झारखंड: यहां मुख्य रूप से कुड़ुख, खड़िया, मुंडारी, नागपुरी और पंचपरगनिया का प्रभाव है।
• संथाल परगना: यहां संथाली और मालतो जैसी जनजातीय भाषाओं के साथ-साथ दुमका, गोड्डा, जामताड़ा में अंगिका का गहरा प्रभाव है।
• पलामू प्रमंडल: गढ़वा और पलामू जैसे क्षेत्रों की सीमा उत्तर प्रदेश और बिहार से सटने के कारण यहां भोजपुरी और मगही का दैनिक उपयोग बड़े पैमाने पर होता है।
अब शुक्रवार 22 मई पर टिकी नजरें, आ सकता है कोई ठोस निर्णय
प्रोजेक्ट भवन में हुई इस पहली बैठक के अंत में सर्वसम्मति से यह तय किया गया कि समिति की अगली अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक आगामी 22 मई, दिन शुक्रवार को आयोजित होगी। इस बीच, शिक्षा विभाग को युद्धस्तर पर राज्य के सभी जिलों का भाषाई सर्वे डेटा, पिछली परीक्षाओं के आंकड़े और शैक्षणिक आवश्यकताओं की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का अल्टीमेटम दिया गया है।

See also  Hardik Pandya गंवा सकते हैं अपनी 70% संपत्ति, Natasa Stankovic के साथ तलाक की अफवाह; IPL में भी चल रहा है खराब वक्त

 

WhatsApp Channel Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now