रांचीः असम के चाय बगान में काम करनेवाले झारखंड के आदिवासी मजदूरों की स्थिति काफी दयनीय है। उन्हें काफी कम मानदेय दिया जाता है। उन्हें सरकारी योजनाओं का भी लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसकी जानकारी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर असर गये झारखंड के प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने वहां 10 दिन रह पूरी स्थित की जानकारी ली। इसका नेतृत्व कल्याण मंत्री चमरा लिंड ने किया। अब उनकी स्थिति को राष्ट्रीय स्तर पर उठाये जाने की तैयारी है।
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विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों से मिले मंत्रीः मौके पर कल्याण मंत्री चमरा लिंडा ने विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों से भी बातचीत की। वह उन इलाकों में गये, जहां चाय बगान में काम करनेवाले मजदूर रहते हैं। कल्याण मंत्री 8 से 18 जनवरी तक असम के दौरे पर रहे। इस दौरान वह मेघालय में ठहरे हुए थे। झारखंड से गये दल में बाद में मंत्री चमरा लिंडा के अलावा विधायक भूषण तिर्की, सांसद विजय कुमार हांसदा, विधायक एमटी राजा भी शामिल हुए थे।
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26 किलो पत्ती तोड़ना अनिवार्यः मंत्री चमरा लिंडा ने बताया कि असम के चाय बगान में काम करने वाले मजदूरों को प्रतिदिन 250 रुपये की मजदूरी मिलती है। इसके साथ ही यह भी शर्त है कि उन्हें प्रतिदिन 26 किलो पत्ती तोड़ना अनिवार्य है। 250 रुपये में से 20 रुपये स्वास्थ्य, हाउस रेंट व अन्य मद में काट ली जाती है। ऐसे में प्रतिदिन एक मजदूर को 200 रुपये मिलते हैं। मजदूरों के लिए छुट्टी का भी प्रावधान नहीं है। ऐसे में पूरे महीने काम करने पर एक व्यक्ति को छह हजार रुपये मिलते हैं। कल्याण मंत्री ने बताया कि चाय बगान में काम करने वाले झारखंड के आदिवासी मजदूरों को सरकारी योजनाओं का भी लाभ नहीं मिलता है। मजदूरों के लिए घर की समूचित व्यवस्था नहीं है। जिस कमरे में रहते हैं, उसमें ही खाना भी बनाते हैं। मजदूरों के पास शौचालय और पीने के पानी की व्यवस्था भी नहीं है।
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आदिवासी महासभा में मुख्य अतिथि होंगे हेमंत सोरेन
ऑल आदिवासी स्टूडेंटस एसोसिएशन ऑफ असम ने 29 जनवरी से एक फरवरी तक तिनसुकिया में 21वीं आदिवासी महासभा का आयोजन किया है। एक फरवरी को झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बतौर मुख्य अतिथि महासभा में शामिल होंगे। इसमें असम में रहने वाले आदिवासियों की समस्याओं और स्थिति पर विचार-विमर्श किया जायेगा।












