जयराम महतो के कार्यक्रम में आएंगें राज्यपाल संतोष गंगवार, आजसू के लिए खतरे की एक और घंटी!

jairam mahto

रांचीः डुमरी के विधायक जयराम महतो अपने सैलरी का 75 फीसदी हिस्सा अपने क्षेत्र के टॉपर्स को देंगे । कार्यक्रम 7 जुलाई को होने वाला था लेकिन अब 8 जुलाई को होगा । तारीख में बदलाव इसलिए हो रहा है क्योंकि राज्यपाल संतोष गंगवार ने डुमरी स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम में आने की सहमति दे दी है । 

जयराम के कार्यक्रम में आएंगें राज्यपाल

राज्यपाल द्वारा नई-नई पार्टी के एकमात्र विधायक जयराम महतो के कार्यक्रम में आने की सहमति देना पहली नजर में एक सामान्य बात नजर आती है लेकिन इसके पीछे भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं और समीकरणों का हिसाब-किताब नजर आता है। डुमरी के विधायक जयराम महतो की लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है।खासतौर से कुड़मी जाति, युवाओं पर उनकी पकड़ की वजह से ही बीजेपी और आजसू गठबंधन को चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ा है ।

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बीजेपी के करीब जा रहे हैं जयराम ?

अब सवाल ये उठ रहा है कि राज्यपाल से जयराम महतो की कई बार हुई मुलाकातें और अब उनके कार्यक्रम में आने की सहमति से संकेत क्या मिल रहा है । बीजेपी को एक ऐसे सहयोगी की सख्त जरुरत है जो ना सिर्फ जेएमएम के वोट में सेंध लगाए बल्कि कुड़मी वोट का ध्रुवीकरण कर सके ।  जयराम महतो में बीजेपी को संभवानाएं नजर आ रही हैं । वैसे तो झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान अनाधिकारिक तौर से ये कहा जाता रहा था बीजेपी ने जयराम को साधने की पूरी कोशिश की लेकिन जयराम महतो ने अकेले लड़ने का फैसला किया । नतीजा सामने रहा । जयराम खुद एक सीट पर जीते लेकिन बीजेपी को हरा दिया ।

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राज्यपाल कर चुके हैं तारीफ

 

जेएमएम के गढ़ में सेंध लगाने का रास्ता

जयराम महतो जेएमएम के गढ़ और पूर्व विधायक जगरनाथ महतो  के इलाके में सेंध लगाने में कामयाब हो चुके हैं । ये इलाका बीजेपी के लिए लगभग शून्य रिजलट वाला रहा है । डुमरी और आस-पास के विधानसभा क्षेत्रों पर जयराम महतो का बड़ा असर है और बीजेपी अच्छी तरह जानती है कि जयराम महतो अगर सध गए तो अगले चुनाव में सत्ता किसके हाथों में होगी ।

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कमजोर आजसू से रिश्ता घाटे का सौदा ?

रही बात आजसू की तो 2024 के चुनाव में आजसू सिर्फ 238 वोटों से सिर्फ मांडू सीट जीत सकी । आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो समेत तमाम नेताओं को हार का सामना करना पड़ा । आजसू की ताकत लगातार घट रही है और बीजेपी को भी इस बात का एहसास है कि कमजोर सहयोगी को साथ रखने से पार्टी सत्ता की सीढ़ी कभी नहीं चढ़ पाएगी ।

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