रांचीः दिशोम गुरु शिबू सोरेन नहीं रहे, लेकिन उनके किस्से झारखंड के गांवों और विशेषकर आदिवासी समाज के बीच लोगों की जुबान पर हमेशा बने रहेंगे। लंबी बीमारी के बाद 81 वर्ष की उम्र में दिल्ली में अंतिम सांस लेने वाले शिबू सोरेन की कर्मभूमि झारखंड के गांव और खेत खलिहानों में रही है। आदिवासियों को सशक्त करने के लिए उन्होंने नशे की लत जैसी कई तरह की कुरीतियों को दूर करने के लिए संघर्ष किया तो शिक्षा की तरफ मोड़ने की भी भरसक कोशिश की।
1970 के दशक में आदिवासियों को अधिकार दिलाने की लड़ाई शुरू करने वाले शिबू सोरेन ने धनबाद के टुंडी में रात्रि पाठशाला शुरू कराई थी। इसमें बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक पढ़ाई करने पहुंचते थे। टुंडी के आंदोलन में शिबू सोरेन के सहयोगी रहे लाला सुराल बताते हैं कि जिस गांव में दिशोम गुरु शिबू सोरेन रात्रि पाठशाला खोलते थे, उस गांव के सबसे पढ़े-लिखे युवक को उसमें पढ़ाने की जिम्मेवारी मिलती थी। यह रात्रि पाठशाला धनबाद से सटे गिरिडीह, जामताड़ा और दुमका में भी शुरू हो गई।
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शिबू सोरेन का मानना था कि दिनभर काम करने वाले मजदूरों को पढ़ाने के लिए रात्रि पाठशाला ही बेहतर विकल्प है। शिबू ने गांवों में रात्रि पाठशाला खोल निरक्षर आदिवासियों को पढ़ना सिखाया। इन कार्यक्रमों के माध्यम से शिबू ने समाज को जगाने का काम किया था। शिबू सोरेन ने आंदोलन के साथ विकास की जमीन तैयार कर राजनीति को नया आयाम दिया। शिबू के मंत्रिमंडल में शामिल शिक्षा मंत्री राजेंद्र तिवारी को रात्रि पाठशाला की देखरेख का जिम्मा था।
3 बड़े भाजपा नेताओं की तारीफ और शब्दों से समझिए शिबू सोरेन का कद

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, झामुमो के संस्थापक संरक्षक और राज्यसभा सांसद दिशोम गुरु शिबू सोरेन का सोमवार सुबह करीब 8 बजे निधन हो गया। झारखंड निर्माता, सामाजिक न्याय के मसीहा गुरुजी के निधन की खबर से झारखंड सहित देशभर में शोक की लहर है। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे और 19 जून से दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में इलाजरत थे।
शिबू सोरेन का कद झारखंड में क्या था, इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि विपक्षी दलों के नेता उन्हें किस रूप में याद कर रहे हैं। राज्य के तीन बड़े भाजपा नेताओं की ओर से की गई तारीफ और शब्दों से यह समझा जा सकता है कि उनका क्या योगदान झारखंड और इसके निवासियों के लिए रहा है।
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झारखंड के लिए लंबी लड़ाई लड़ी: बाबूलाल मरांडी
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व झामुमो संरक्षक शिबू सोरेन के निधन की खबर अत्यंद दुखद है। शिबू सोरेन ने जब राजनीति व सामाजिक जीवन में कदम रखा, तब मैं छात्र जीवन में था। सबसे पहले उन्होंने सामाजिक आंदोलन शुरू किया। महाजनों के विरोध में आंदोलन किया। लोगों ने भी पूरा साथ दिया। शराबबंदी को लेकर भी उन्होंने बड़ा आंदोलन चलाया। उस वक्त मैं गांव में पढ़ता था। लेकिन यह आंदोलन का ही असर था कि सड़क किनारे शराब नहीं बिकती थी। लोग शराब बेचने से डरने लगे थे। गांव-गांव में जागरुकता आई थी।
शिबू सोरेन से गुरुजी तक का सफर महाजनी व शराब बंदी आदोलन से ही मुमकिन हुआ। जयपाल सिंह मुंडा के बाद राजनीतिक आंदोलन की ये दूसरी पीढ़ी के नेता थे। झारखंड राज्य के लिए लंबी लड़ाई इन्होंने लड़ी। अलग राज्य के आंदोलन को मुकाम तक पहुंचाने में गुरुजी का योगदान था। वह क्षेत्रीय राजनीति करते थे। मैं शुरू से राष्ट्रीय राजनीति राजनीति करता था। हमारे राजनीतिक विचारों में आधारभूत अंतर रहा था। क्षेत्रवाद या फिर वर्ग विशेष की राजनीति वह करते थे। हमारे बीच विचारों का विरोध था। उनका जाना झारखंड की राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति है।
मेरे लिए पिता तुल्य रहे सदैव पुत्र का स्नेह दिया: रघुवर दास
झारखंड आंदोलन के अगुआ, दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन से मर्माहत हूं। उनका जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। वह मेरे पिता तुल्य रहे हैं। उनसे सदैव मुझे पुत्र के समान ही स्नेह मिला। गुरुजी के मुख्यमंत्री बनने पर मुझे उपमुख्यमंत्री के पद पर काम करने का सौभाग्य मिला। मरांग बुरु पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें। मेरे जैसे उनके लाखों प्रशंसकों, उनके समर्थकों, उनके परिजनों को यह पीड़ा सहने की शक्ति प्रदान करें। उनके निधन से एक युग का अंत हो गया।
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झारखंड की राजनीति के वर्तमान को अतीत से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी आज टूट गई। झारखंड में उनके साथ काम करने का जो अनुभव मुझे हुआ, उसमें यही पाया कि सभी दलों, सभी मतों को मानने वालों के प्रति उनके हृदय में मान-सम्मान था। वे सबके अपने थे। उनके निकट आकर ऐसा लगता था जैसे किसी ऋषि की छत्र-छाया में बैठे हों। वे सर्वमान्य नेता थे। उनमें बाहरी-भीतरी का भेदभाव नहीं था। वे बहुत ही सरल, सीधे-साधे, सादा जीवन-उच्च विचार वाले व्यक्ति थे। अपने माटी के पुत्र को खोकर आज पूरा झारखंड शोकमय है। मरांग बुरु चाची रूपी सोरेन समेत समस्त सोरेन परिवार को यह असीम क्षति सहने की ईश्वर शक्ति दें।
गुरुजी से जनसंघर्ष और नेतृत्व की गहराई को समझा: अर्जुन मुंडा
झारखंड आंदोलन के प्रणेता पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन से मुझे बड़ा धक्का लगा है। गुरुजी का जाना झारखंड की राजनीति और सामाजिक चेतना के लिए अपूरणीय क्षति है। मुंडा ने एक्स पर कहा है कि गुरुजी का पूरा जीवन सामाजिक न्याय, आदिवासी अधिकारों और जनसेवा को समर्पित रहा। महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन से लेकर झारखंड राज्य निर्माण तक उन्होंने लगातार संघर्ष किया और जनसंवाद पर बल दिया।
राजनीतिक जीवन की शुरुआत में उन्हें गुरुजी के साथ काम करने का अवसर मिला, जहां उन्होंने आंदोलन, नेतृत्व और जनसंघर्ष की गहराई को नजदीक से समझा। सुदूर जंगलों और गांवों में शिबू सोरेन डुगडुगी और नगाड़ा बजवाकर लोगों को सभा में बुलाते थे। आदिवासियों की जमीन से जुड़ी समस्याओं पर चिंतित रहने वाले गुरुजी मानते थे कि जमीन से कटकर आदिवासी जीवित नहीं रह सकता। उनके लिए विस्थापन, मुआवजा और पुनर्वास जैसे मुद्दे अत्यंत संवेदनशील थे। गुरुजी हमारे बीच नहीं हैं, यह सिर्फ एक नेता का जाना नहीं, बल्कि विचारों और संघर्ष की एक पीढ़ी का जाना है। उनके योगदान को सदैव याद रखा जाएगा।
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