डेस्कः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए एंटी डिस्क्रिमिनेशन नियमों को लेकर देश के शैक्षणिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। दिल्ली के विभिन्न कॉलेजों के छात्रों द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शन और ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ (उल्टा भेदभाव) के आरोपों के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सरकार का रुख स्पष्ट किया है।
उन्होंने कहा है, मैं सभी को भरोसा दिलाता हूं कि कोई भेदभाव नहीं होगा। कोई भी कानून का गलत इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। किसी का उत्पीड़न नहीं होगा। उधर, यूजीसी के नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि इन नियमों में जाति आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई गई है। साथ ही संस्थागत सुरक्षा से कुछ श्रेणियों को बाहर कर दिया गया है।
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सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका में कहा गया है, हाल ही में यूजीसी ने जो गाइडलाइन जारी की है वो गैर-समावेशी है। याचिका में नियमों की इन आधार पर आलोचना की गई है कि जातिगत भेदभाव को सख्ती से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है।
#WATCH | On new regulation of UGC, Union Education Minister Dharmendra Pradhan says," I assure everyone there will be no discrimination and no one can misuse the law." pic.twitter.com/0ZRgWaU76H
— ANI (@ANI) January 27, 2026
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आइए जानते हैं कि इस याचिका में और क्या-क्या कहा गया है
जाति-आधारित भेदभाव का दायरा सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी तक सीमित करके यूजीसी ने सामान्य वर्ग को संस्थागत सुरक्षा और उनकी शिकायत निवारण से असल में इनकार किया है। ये भी नहीं विचार किया गया कि इस वर्ग को भी अपनी जाति की पहचान के आधार पर उत्पीड़न या भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है।
यह नियम अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) और 15(1) (धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव पर रोक) के तहत मिले मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।
यह नियम संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है) के खिलाफ है।




