चंपाई सोरेन BJP से नाराज, नगर निकाय चुनाव में रायशुमारी से रखा गया दूर, आदित्यपुर-सरायकेला में उतारे समर्थक उम्मीदवार

चंपाई सोरेन BJP से नाराज, नगर निकाय चुनाव में रायशुमारी से रखा गया दूर, आदित्यपुर-सरायकेला में उतारे समर्थक उम्मीदवार

रांचीः झारखंड में हो रहे नगर निकाय चुनाव में गठबंधन ही नहीं राजनीतिक पार्टियों के अंदर भी दरार और नाराजगी सतह पर आ गई है। धनबाद में मेयर पद के लिए बीजेपी समर्थक उम्मीदवार के खिलाफ बीजेपी के झरिया से वर्तमान विधायक रागिनी सिंह के पति चुनाव मैदान में उतरकर बगावत का बिगुल फूंक दिया तो वहीं दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन भी नगर निकाय चुनाव के दौरान उम्मीदवारों के चयन को लेकर हुई रायशुमारी से दूर रखे जाने पर नाराज हो गये है।

झारखंड के 117 IPS अधिकारियों ने दिया संपत्ति का ब्यौरा, IG आशीष बत्रा ने खरीदी 4.33 करोड़ की जमीन
चंपाई सोरेन का कहना है कि पार्टी की ओर से उन्हें बैठकों और रायशुमारी को लेकर कोई सूचना ही नहीं दी जाती है। जब बुनियादी जानकारी तक साझा नहीं की जाती, तो फिर सक्रिय भूमिका निभाने का सवाल कहां उठता है। चंपाई सोरेन ने संकेत दिया कि इस घटनाक्रम के पीछे कोई प्रभावशाली व्यक्ति हो सकता है, जो नहीं चाहता कि वे पार्टी के भीतर ज्यादा सक्रिय रहें।

भारत-पाकिस्तान के बीच T-20 वर्ल्ड कप मैच होगा! बांग्लादेश को भी नहीं मिलेगी ‘सजा’
घाटशिला विधानसभा उपचुनाव में चंपाई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन की हार का अंतर बढ़ने के पीछे भी बीजेपी के अंदर का अंतरकलह माना जाता है। उपचुनाव में हार के बाद बीजेपी के अंदर चंपाई सोरेन का राजनीति वजन और कम हो गया है। कहा तो ये जाता है कि न चंपाई अपने स्टाइल की राजनीति बीजेपी में चलाना चाहते है जबकि बीजेपी में संगठन अपने तरीके से कार्य करता है वो किसी व्यक्ति विशेष के इशारे पर नहीं काम करता है। चंपाई सोरेन के आरोपों पर आदित्यपुर नगर निगम चुनाव के प्रभारी शैलेंद्र सिंह का कहना है कि चंपाई प्रायः मोबाइल पास में नहीं रखते या बंद रखते है। उनके पीए चंचल गोस्वामी को कार्यक्रमों-बैठकों की सूचना दी जाती है, पर वे शामिल नहीं होते है। शैलेंद्र सिंह ने कहा कि चंपाई सोरेन चाहते थे कि किसी एक प्रत्याशी को पार्टी का समर्थन न दिया जाए। उनका मानना था कि जो भी जीतकर आएगा, वह भाजपा का ही होगा। हालांकि, पार्टी ने रायशुमारी के बाद सभी नगर निगम क्षेत्रों में एक-एक प्रत्याशी को आधिकारिक समर्थन देने का फैसला किया। चंपाई सोरेन ने यह निर्णय नहीं माना। उनका यह भी दावा है कि पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री अरुण सिंह की बैठक समेत सभी बैठकों की सूचना चंपाई सोरेन को दी गई थी।

See also  Ulgulan Rally: को बाबूलाल ने बताया सनातन विरोधी, झारखंड विरोधी, लगाया आचर संहिता का उल्लंघन का आरोप

9600 करोड़ के घोटाले में गिरिडीह का युवक गिरफ्तार, गुलशन कुमार दराद को CID ने धर दबोचा
आदित्यपुर-सरायकेला में चंपाई समर्थकों के मैदान में उतरने से बढ़ा टकराव
चंपाई सोरेन और बीजेपी के अंदर का राजनीति विवाद उस समय और बढ़ गया जब यह बात सामने आयी कि आदित्यपुर नगर निगम और सरायकेला नगर पंचायत चुनाव में चंपाई सोरेन ने अपने समर्थकों को खड़ा कर दिया है। पार्टी द्वारा आधिकारिक समर्थन घोषित किए जाने के बावजूद उनके समर्थक उम्मीदवारों ने नामांकन वापस नहीं लिया। आदित्यपुर नगर निगम में चंपाई समर्थक सुनीता लियांगी चुनाव मैदान में बनी हुई हैं, जबकि सरायकेला नगर पंचायत में पार्टी समर्थित प्रत्याशी सुमित चौधरी के खिलाफ उनके पूर्व विधायक प्रतिनिधि सानंद आचार्या चुनाव लड़ रहे हैं। इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या चंपाई अलग राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र तैयार कर रहे हैं।

चतरा में महिला की गोली मारकर हत्या, पति से अलग होकर प्रेमी के साथ कर ली थी दूसरी शादी
चंपाई सोरेन और शैलेंद्र सिंह के परस्पर विरोधी बयानों के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी के अंदर कोई अंतरूनी राजनीति चल रही है जो नगर निकाय चुनाव में सतह पर आ गई है। कोल्हान टाइगर कहे जाने वाले चंपाई सोरेन की राजनीति बीजेपी में हाशिए पर चली गई है। घाटशिला चुनाव में हार के बाद चंपाई सोरेन के राजनीतिक प्रभाव पर पड़ा ग्रहण लग गया है। चंपाई सोरेन को 2024 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बड़े राजनीतिक संदेश के साथ बीजेपी में ज्वाइन कराया गया था। बीजेपी ने उस समय बड़ा आदिवासी चेहरा बताया था। उस चुनाव में बीजेपी को कोल्हान में चमत्कार की उम्मीद थी लेकिन चंपाई वो कर नहीं पाए। सरायकेला सीट पर वो तो चुनाव जीत गए लेकिन अपने बेटे बाबूलाल सोरेन को घाटशिला में जीत दिला नहीं पाए। चंपाई की राजनीति चमक तब और फीकी हो गई जब घाटशिला उपचुनाव में उनके बेटे की हार का अंतर और बढ़ गया। झारखंड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकार गठन के सवा साल हो चुके है लेकिन विधानसभा के अंदर चंपाई सोरेन की आवाज एक बार फिर नहीं सुनाई दी है। विधानसभा सत्र के दौरान या तो चंपाई सोरेन आते नहीं है और अगर आते भी है तो सिर्फ सदन में थोड़ी देर बैठकर चले जाते है। उन्होंने अभी तक सदन के अंदर न तो कोई सवाल उठाया है और न ही किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया ही दी है। नगर निकाय चुनाव के बहाने चंपाई सोरेन और बीजेपी के बीच का अंतर और बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है।

See also  दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025: भाजपा की प्रचंड जीत, 27 साल बाद सत्ता में वापसी
WhatsApp Channel Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now