पेसा नियमावली पर भाजपा का तीखा हमला, हेमंत सरकार से पुनर्विचार की मांग

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January 8, 2026

रांची। झारखंड में हेमंत सरकार द्वारा जारी पेसा नियमावली को लेकर बाबूलाल मरांडी ने कड़ा ऐतराज जताया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष मरांडी ने आरोप लगाया कि नई नियमावली जनजातीय समाज की रूढ़िवादी आस्था, विश्वास और उपासना पद्धतियों पर सीधा प्रहार है।

मरांडी ने कहा कि हेमंत सरकार ऐसी व्यवस्था लागू करना चाहती है, जिसमें रूढ़िवादी विश्वास और उपासना पद्धति छोड़ चुके लोगों को ग्रामसभा अध्यक्ष बनाने का रास्ता खुलता है, जो पेसा एक्ट की मूल भावना के विरुद्ध है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस पार्टी सत्ता के सुख के लिए आदिवासियों के अधिकारों पर डाका डलवा रही है।

उन्होंने याद दिलाया कि 1996 में केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पेसा एक्ट इसलिए बनाया था ताकि देशभर के 700 से अधिक जनजातीय समूहों की कमजोर होती रूढ़िवादी परंपराओं को संरक्षण और मजबूती मिल सके। लेकिन झारखंड में जारी नियमावली जनजातीय समाज को दिग्भ्रमित कर रही है।

मरांडी ने पेसा एक्ट 1996 की धारा 4(क) का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी राज्य की पंचायत संबंधी विधि को रूढ़िजन्य विधि, सामाजिक-धार्मिक प्रथाओं और समुदाय के संसाधनों की पारंपरिक प्रबंधन प्रणालियों के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि रूढ़िजन्य विधि का अर्थ विश्वास और उपासना पद्धति से है, जो अलग-अलग जनजातियों में भिन्न होती है।

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उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि संथाल समाज मरांग बुरू और जाहिर आयो को मानता है तथा जाहिर थान और मांझी थान में पूजा करता है। इसी प्रकार मुंडा, उरांव, हो, खड़िया समेत अन्य जनजातियों की अपनी-अपनी आस्था और उपासना पद्धतियां हैं। एक्ट के अनुसार ग्रामसभा का अध्यक्ष वही हो सकता है, जो इन रूढ़िवादी विश्वासों और उपासना पद्धतियों से जुड़ा हो।

मरांडी ने आरोप लगाया कि हेमंत सरकार की नियमावली में ‘परंपरा’ और ‘रीति-रिवाज’ शब्द तो जोड़े गए हैं, लेकिन ‘रूढ़िवादी’ शब्द को जानबूझकर हटाया गया है, जिससे आदिवासी समाज में असंतोष है। उन्होंने कहा कि जिसने रूढ़िवादी विश्वास और उपासना छोड़ दी है, उसे ग्रामसभा अध्यक्ष बनने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मांग की कि नियमावली में पेसा एक्ट की भाषा को अक्षरशः शामिल किया जाए। साथ ही चेतावनी दी कि यदि सरकार ने पुनर्विचार नहीं किया, तो भारतीय जनता पार्टी गांव-गांव जाकर जनता की अदालत में इस मुद्दे को उठाएगी और आदिवासी समाज को उनके अधिकारों पर हो रहे प्रहार से अवगत कराएगी।

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