पटना: बिहार विधान परिषद की 10 सीटों पर हुए चुनाव में एनडीए ने अपना दबदबा कायम रखते हुए क्लीन स्वीप कर लिया। नामांकन वापसी की समयसीमा खत्म होने के बाद सभी 10 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए।ऐसे में मतदान की जरूरत ही नहीं पड़ी और उम्मीदवारों की जीत पर सीधे मुहर लग गई।इस चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर बिहार की मौजूदा राजनीतिक ताकत का संकेत दिया है। एनडीए गठबंधन ने अधिकांश सीटों पर कब्जा जमाया, जबकि विपक्ष को सीमित सफलता से संतोष करना पड़ा।
भोजपुरी स्टार पवन सिंह और निशांत बने MLC
इस चुनाव की सबसे ज्यादा चर्चा जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की रही। निशांत कुमार पहली बार बिहार विधान परिषद पहुंचे हैं।उनके अलावा जदयू की ओर से भारती मेहता, शिवानी देवी प्रजापति और ललन प्रसाद भी निर्वाचित हुए हैं।उनके साथ भाजपा के संजय प्रकाश मयूख,अनिल ठाकुर और शीला पंडित भी विधान परिषद पहुंचे हैं। लोजपा (रामविलास) से अशरफ अंसारी और राजद से सुनील सिंह भी निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं।सभी निर्वाचित सदस्य विधान परिषद पहुंच अपना सर्टिफिकेट प्राप्त कर रहे हैं। वहीं पवन सिंह अभी लखनऊ में हैं।उनके भाई रितिक सर्टिफिकेट लेने पहुंचे थे।

मतदान की नहीं पड़ी जरूरत
विधान परिषद की 9 सीटों पर द्विवार्षिक चुनाव और एक सीट पर उपचुनाव होना था। कुल 10 सीटों के लिए सिर्फ 10 उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया था।नामांकन पत्रों की जांच में सभी उम्मीदवारों के पर्चे वैध पाए गए।इसके बाद चुनाव मैदान में उम्मीदवारों की संख्या और सीटों की संख्या बराबर होने से मतदान की जरूरत नहीं पड़ी।
किस पार्टी को कितनी सीटें?
इस चुनाव में भाजपा और जदयू को 4-4 सीटें मिली हैं। वहीं लोजपा (रामविलास) और राजद के खाते में एक-एक सीट गई है। इस तरह एनडीए ने कुल 9 सीटों पर जीत दर्ज की है।
दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर संकट?
चुनाव परिणाम के बीच सबसे ज्यादा चर्चा पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर हो रही है।राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश इस बार एमएलसी नहीं बन सके।उन्हें एनडीए की ओर से उम्मीदवार नहीं बनाया गया था। ऐसे में अब उनके मंत्री पद को लेकर सवाल उठने लगे हैं।दीपक प्रकाश बिना किसी सदन के सदस्य बने ही दो बार बिहार सरकार में मंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। हाल ही में नई सम्राट सरकार के गठन के बाद भी उन्हें मंत्री बनाया गया था। अब तय समय के भीतर किसी सदन की सदस्यता नहीं मिलने की स्थिति में उनके मंत्री पद पर संकट गहरा सकता है। राजनीतिक गलियारों में इसको लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।




