डेस्कः वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने रविवार को कांगो और युगांडा में फैले इबोला के प्रकोप को इंटरनेशनल पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया है।हालांकि, WHO ने स्पष्ट किया कि बंडिबुग्यो वायरस से फैला यह संक्रमण महामारी (Pandemic) घोषित किए जाने के मानकों पर खरा नहीं उतरता।संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी के मुताबिक, शनिवार तक कांगो के इतुरी प्रांत में कम से कम तीन स्वास्थ्य क्षेत्रों (बुनिया, रवामपारा और मोंगब्वालू) में 80 संदिग्ध मौतें, 8 लैब में पुष्टि किए गए मामले और 246 संदिग्ध केस सामने आए हैं।
कांगो के स्वास्थ्य मंत्री सैमुअल-रोजर कंबा के मुताबिक, पहला मामला एक नर्स का माना जा रहा है, जिसकी 24 अप्रैल को मौत हुई थी। जांच में अब तक इबोला के बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के 8 मामलों की पुष्टि हुई है।बीमारी फिलहाल इतुरी प्रांत के बुनीया, रवामपारा और मोंगवालू इलाकों तक पहुंच चुकी है। कांगो में 1976 में पहली बार इबोला सामने आया था। यह देश में इसका 17वां मामला है।एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस बार इबोला का बुंडीबुग्यो स्ट्रेन मिला है, जबकि कांगो में पहले ज्यादातर मामले जायरे स्ट्रेन के रहे हैं। इससे चिंता बढ़ी है, क्योंकि इबोला के मौजूदा कई इलाज और टीके जायरे स्ट्रेन को ध्यान में रखकर बनाए गए थे।
इबोला पहली बार 1976 में सामने आया
पूरी दुनिया में इबोला वायरस डिसीज (EVD) से पीड़ित मरीजों में 25% से 90% की मौत होती है। इबोला वायरस पहली बार 1976 में अफ्रीका में सामने आया था। उस समय सूडान और तत्कालीन जायरे (अब डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो) में इसके मामले मिले थे। कांगो में जिस इलाके में यह वायरस मिला, उसके पास बहने वाली इबोला नदी के नाम पर इसका नाम रखा गया। यह जानलेवा बीमारी संक्रमित व्यक्ति के खून, उल्टी और शरीर के दूसरे तरल पदार्थ के संपर्क से फैलती है।
2014-16 का प्रकोप सबसे घातक रहा
इबोला से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में कांगो शामिल है, जहां कई बार इसके मामले सामने आ चुके हैं। 2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में फैला इबोला इतिहास का सबसे बड़ा प्रकोप था। इस दौरान 11 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। बाद के वर्षों में वैक्सीन और इलाज विकसित होने से हालात संभालने में मदद मिली, लेकिन अलग-अलग स्ट्रेन सामने आने पर चुनौती बढ़ जाती है।
क्या है इबोला?
बता दें, इबोला एक बहुत खतरनाक वायरस से होने वाली बीमारी है। यह संक्रमण दुर्लभ जरूर है, लेकिन काफी गंभीर और कई मामलों में जानलेवा साबित होता है।यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों जैसे खून, उल्टी, पसीना या वीर्य के संपर्क में आने से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। इसका कोई पक्का इलाज अभी तक नहीं है, लेकिन वैक्सीन उपलब्ध है। कांगो से यात्रा कर रहे दो व्यक्तियों में 15 और 16 मई 2026 को, युगांडा के कंपाला में एक दूसरे से कोई स्पष्ट संबंध न होने के बावजूद, दो प्रयोगशाला-पुष्टि मामले दर्ज किए गए हैं।

