पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह हत्याकांड: पुलिस से ये गलतियां नहीं होती तो संजीव सिंह को हो जाती उम्रकैद… पढ़िए आखिर कैसे बच गए बीजेपी नेता ?

धनबाद: नीरज सिंह की हत्यारे खुलेआम घूम रहे हैं । संजीव सिंह और उनके साथ बरी हुए आरोपियों ने अगर धनबाद के पूर्व डिप्टी मेयर और पूर्णिमा सिंह के पति की हत्या नहीं की तो आखिर हत्यारा कौन है ? ये सवाल तब तक कौंधता रहेगा जब तक कि सरे-शाम धनबाद के सबसे व्यस्ततम इलाके में नीरज सिंह समेत मार गए चार लोग के असली हत्यारे नहीं पकड़े जाते हैं । बीजेपी के पूर्व विधायक और नीरज सिंह के चचेरे भाई संजीव सिंह के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला जिसकी वजह से वे सलाखों से बाहर हैं । पूर्णिमा नीरज सिंह अपने पति के असली हत्यारों को सजा मिलते हुए शायद ही देख पाए..क्योंकि जिस हिसाब से जांच एजेंसियां या कहें अभियोजन पक्ष ने जांच में लापरवाहियां बरती हैं उससे संजीव सिंह को तो राहत मिली लेकिन असली हत्यारे कौन है इसका कहीं कोई अता-पता नहीं। 

संजीव सिंह को ही हत्यारा मानना चूक थी ?

सबसे बड़ी बात और जिसे पुलिस से चूक माना जा सकता है वो है जांच की दिशा, आरोपियों की पहचान में भारी चूक । जिस तरीके से पुलिस ने जांच की उससे ये माना जा सकता है कि शुरुआत में ही पुलिस ने ये मान लिया था कि हत्या संजीव सिंह और उनके साथियों ने की है । ये बड़ी लापरवाही माना जा सकता है क्योंकि पुलिस ने जांच की दिशा संजीव सिंह की ओर ही केंद्रित कर दी जिससे असली हत्यारा अगर संजीव नहीं कोई और है तो उस पर शक की सुई सुई तक नहीं गई ।

592 पृष्ठों में नीरज सिंह हत्याकांड का फैसला 

नीरज सिंह हत्याकांड में 27 अगस्त को फैसला आ गया । धनबाद की कोर्ट की वेबसाइट पर फैसला अपलोड होने पर अब फैसलों की बारिकियों और अभियोजन पक्ष की नाकामियों को समझने का वक्त है । 21 मार्च 2017 को हुई इस हत्या का मुकदमा धनबाद के एडिशनल सेशन जज दुर्गेश सी अवस्थी की अदालत में हुआ । एमपी-एमएलए कोर्ट में आए इस फैसले को पढ़ने से ये साफ लगता है कि पुलिस की जांच कितनी नाकाम साबित हुई। 592 पन्नों के अपने फैसलों में एडिशनल सेशन जज दुर्गेश सी अवस्थी ने जो फैसला सुनाया है उसमें बचाव पक्ष यानी संजीव सिंह की दलीलें बहुत भारी पड़ीं। 

परिस्थितिजन्य साक्ष्य जुटाने में नाकाम

धनबाद की एमपी-एमएलए कोर्ट ने माना है कि ” पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य (circumstantial evidence) का है। अभियोजन को आरोपित व्यक्तियों के अपराध सिद्ध करने के लिए परिस्थितियों की श्रृंखला स्थापित करनी होती है, जिसमें यह भी सिद्ध करना शामिल है कि अभियुक्त अंतिम बार मृतक के साथ देखे गए थे। ऐसी परिस्थितियों का वास्तविक घटना से सीधा और निकट संबंध होना चाहिए — अर्थात घटना कैसे हुई और किसने अंजाम दी। केवल अपराध के पीछे उद्देश्य (motive) का उल्लेख साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है, जब तक कि वह स्वयं घटना से गहराई से जुड़ा न हो। वर्तमान मामले में अभियुक्तों के बयानों का जिक्र तो मिलता है, किन्तु कोई आपत्तिजनक वस्तु बरामद नहीं हुई, जो कि परिस्थितियों की श्रृंखला स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

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नीतीश कटारा हत्याकांड में Circumstantial Evidence था अहम

देश के चर्चित मामलों में एक नीतीश कटारा हत्याकांड में circumstantial evidence या परिस्थितिजन्य साक्ष्य महत्वपूर्ण था और दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में अभियोजन पक्ष इसे साबित करने में कामयाब रहा । लेकिन धनबाद पुलिस और अभीयोजन पक्ष को ये कामयाबी हासिल नहीं हो पाई। अदालत ने अपने फैसले में सिलसिलेवार ढंग से बताया है कि कहां-कहां मृतक नीरज सिंह की दलील नाकाम रही  । 

अभिषेक सिंह ने देर से कराई एफआईआर

नीरज सिंह हत्याकांड में सबसे महत्वपूर्ण गवाह थे अभिषेक सिंह । मृतक नीरज सिंह के भाई अभिषेक सिंह की गवाही और दलीलें बुरी तरह से बचाव पक्ष की ओर से खारिज कर दी गई । अभिषेक सिंह ने हत्याकांड के दो दिनों बाद यानी 23 मार्च 2017 को संजीव सिंह और अन्य के खिलाफ नामजद एफआई कराई । अभिषेक सिंह ये साबित करने में नाकाम रहे कि एफआईआर कराने में इतनी देर क्यों हुई । कोर्ट ने माना कि “उल्लेखनीय है कि स्टेशन डायरी में दर्ज तथ्यों से स्पष्ट होता है कि 23.03.2017 की सुबह 06:15 बजे तक किसी ने भी पुलिस को किसी भी व्यक्ति की संलिप्तता की सूचना देने का प्रयास नहीं किया था। इसके बाद भी स्टेशन डायरी में दर्ज प्रविष्टियों के अनुसार पुलिस के सामने हमलावरों का कोई उल्लेख नहीं मिलता।” 

अभिषेक सिंह की मानसिक हालत की दलील पर भरोसा नहीं

कोर्ट के सामने अभिषेक सिंह ने एफआईर में देरी की वजह मानसिक आघात को बताया लेकिन ये दलील भी नहीं चली । कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा ” यह सर्वविदित है कि कोई व्यक्ति अपने परिजन की हत्या जैसे जघन्य अपराध के बाद मानसिक आघात की स्थिति में हो सकता है। किन्तु जब गंभीर आरोपों के साथ ठोस साक्ष्य और दस्तावेजी रिकॉर्ड प्रस्तुत किए जाते हैं, और अभियोजन पक्ष के गवाह स्वयं स्वीकार करते हैं कि एफ.आई.आर. दर्ज करने में विलंब हुआ, तो यदि अभियोजन उस विलंब का उचित स्पष्टीकरण देने में विफल रहता है, तो यह अभियोजन के लिए घातक सिद्ध होता है। यदि बचाव पक्ष दस्तावेजी साक्ष्य के माध्यम से यह साबित करता है, तो अभियोजन की कहानी में अलंकरण की संभावना बनती है और ऐसी स्थिति में विलंब अभियोजन के लिए प्राणघातक सिद्ध होता है।”

TIP में भी फेल अभियोजन पक्ष

टीआईपी में हुई चूक भी एक बड़ा मसला रहा जिससे संजीव सिंह को बचने में मदद मिली । कोर्ट ने कहा कि  डाबलू मिश्रा और अन्य शूटरों की टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (T.I.P.) संदेहास्पद पाई गई। यह स्थापित विधि सिद्धांत है कि TIP में उजागर तथ्य केवल तभी साक्ष्य बनते हैं जब उन्हें न्यायालय में पुष्टि एवं पहचान प्राप्त हो, अन्यथा उनका कोई मूल्य नहीं होता। इस मामले में जाँच अधिकारी के अनुसार, पी.डब्ल्यू. 6 आदित्य राज एक महत्वपूर्ण गवाह थे, जिन्होंने चारों शूटरों की पहचान की थी। इसके अलावा, पी.डब्ल्यू. 28 राम अहलाद राय ने डाबलू मिश्रा को पहचाना, जिसने उनका घर किराये पर लिया था, और उनकी पत्नी पी.डब्ल्यू. 29 उमदा देवी ने भी डाबलू मिश्रा को ‘मुन्नाजी’ के रूप में पहचाना।

अखबारों में छपी तस्वीरों से कबाड़ा

गौरतलब है कि  TIP से पूर्व शूटरों और डाबलू मिश्रा की तस्वीरें स्थानीय समाचारपत्रों में प्रकाशित हो चुकी थीं। इस कारण TIP संदेहास्पद हो गई। बचाव पक्ष ने यह विरोध किया कि सभी शूटरों की पहचान गवाहों ने जेल में TIP के दौरान की, जबकि उनकी तस्वीरें पहले ही अखबारों में प्रकाशित हो चुकी थीं। इस प्रकार, संदिग्धों (शूटरों) की पहचान का कोई प्रमाणिक महत्व नहीं रह जाता, क्योंकि मुख्य गवाह आदित्य राज की घटना स्थल पर मौजूदगी ही संदिग्ध है।

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नीरज सिंह-संजीव सिंह की दुश्मनी की कहानी भी नहीं मानी

नीरज सिेंह और संजीव सिंह के परिवारों की जिस दुश्मनी की कहानियां धनबाद के बच्चे-बच्चे की जुबान पर फिल्में बन चुकी हैं उस कहानी को सच साबित करने में भी सरकार का अभियोजन पक्ष पूरी तरह से विफल रहा  । कोर्ट ने नीरज सिंह और संजीव सिंह के परिवारों में चली आ रही दुश्मनी के हर एंगल को मानने से इनकार कर दिया । अभियोजन पक्ष के गवाह और नीरज सिंह के भाई अभिषेक सिंह ने 08.03.2019 को दिए गए बयान में माना कि उनके पिता और परिवार के अन्य लोग स्व. सूर्य देव सिंह के साथ रहते थे और सारी संपत्ति संयुक्त थी। वर्ष 2007 में वे लोग रघुकुल चले गए, पर कारोबार 1996-97 से ही अलग हो चुका था। गाँव की संपत्ति भी उनके नाम, उनकी माँ के नाम, एकलव्य सिंह और नीरज सिंह की पत्नी के नाम पर दर्ज हो चुकी थी। इसलिए संपत्ति विवाद को लेकर दुश्मनी की बात सही नहीं मानी जा सकती।

राजनीतिक दुश्मनी भी साबित नहीं हुई

राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बारे में अभिषेक सिंह ने कहा कि नीरज सिंह ने 2009 और 2014 में चुनाव लड़ा, लेकिन 2014 में वे संजीव सिंह से 34 हजार वोटों से हार गए। बाद में जब संजीव सिंह जेल गए तो नीरज सिंह की पत्नी पूनम सिंह झरिया सीट से जीत गईं। ऐसे में राजनीतिक दुश्मनी का आरोप भी तर्कसंगत नहीं है।

यूनियन की लड़ाई की दलील भी खारिज

यूनियन की लोकप्रियता के मुद्दे पर भी साफ हुआ कि 1981 में स्व. सूर्य देव सिंह ने जनता मजदूर संघ बनाया था, जिसे 2005-06 में दो हिस्सों में बाँट दिया गया। नीरज सिंह स्थानीय स्तर पर संयुक्त सचिव बने, जबकि संजीव सिंह राष्ट्रीय स्तर की केंद्रीय संस्था में उपाध्यक्ष और जेबीसीसीआई के सदस्य थे। ऐसे में यह मानना कठिन है कि इतनी ऊँची स्थिति वाला व्यक्ति सिर्फ स्थानीय स्तर के नेता से दुश्मनी रखेगा।

बदला लेने के लिए की गई हत्या ?

इसके अलावा अभियोजन ने यह भी कहा कि संजीव सिंह के करीबी रंजय सिंह की हत्या होने से वे नाराज थे और बदला लेने की योजना बनाई गई। लेकिन न तो अभिषेक सिंह और न ही एकलव्य सिंह ने इस बारे में कुछ कहा। साथ ही, रंजय सिंह की हत्या का आरोप नीरज सिंह पर था ही नहीं। इसलिए यह कारण भी टिकाऊ नहीं पाया गया । इस तरह न्यायालय ने माना कि न तो संपत्ति विवाद, न राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, न यूनियन की लोकप्रियता और न ही बदले की भावना – कोई भी कारण अभियोजन पक्ष संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

मोबाइल टावर लोकेशन का क्या था खेल

अभियोजन पक्ष की दलीलों में कितना दम तो इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि  मोबाइल नंबर का लोकेशन टावर तक सही से नहीं  दिया जा सका ।  कोर्ट ने माना है कि किसी मोबाइल नंबर की टॉवर लोकेशन ठीक से उपलब्ध नहीं है और अभियोजन पक्ष ने उसे पुख्ता साक्ष्यों से साबित भी नहीं किया है, तो ऐसे सबूत को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा यह मोबाइल नंबर चुन्नी ठठेरा के नाम पर जारी हुआ था, लेकिन अभियोजन पक्ष चुन्नी ठठेरा को अदालत में पेश नहीं कर पाया ताकि यह साबित हो सके कि वह नंबर उनके पास नहीं था और किसी और के इस्तेमाल में था। साथ ही, अभियोजन पक्ष ने किसी भी गवाह को प्रस्तुत नहीं किया जो यह साबित कर सके कि यह मोबाइल नंबर जिस हैंडसेट में डाला गया था, वह डब्लू मिश्रा के कब्जे में था। इसलिए यह स्पष्ट है कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि यह मोबाइल नंबर डब्लू मिश्रा उर्फ राकेश कुमार मिश्रा उर्फ डब्लू गिरी उर्फ मृत्युंजय गिरी के इस्तेमाल में था।

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नीरज सिंह हत्याकांड में बरी हुए आरोपी-

संजीव सिंह, उम्र लगभग 40 वर्ष, पिता – स्व. सूर्यदेव सिंह, निवासी – ग्राम गुनिया, थाना – बैरिया, जिला – बलिया (उत्तर प्रदेश), वर्तमान पता – सिंह मैंशन, सरायढेला, थाना – सरायढेला, जिला – धनबाद।

 जैनेंद्र कुमार सिंह @ पिंटू सिंह, उम्र लगभग 48 वर्ष, पिता – जगन्नाथ सिंह, निवासी – ग्राम बहारौली, थाना – मस्रक, जिला – सारण (बिहार), वर्तमान पता – सीएमपीएफ कॉलोनी, सरायढेला, थाना – सरायढेला, जिला – धनबाद।

रंधीर धनंजय कुमार @ धनजी, उम्र लगभग 49 वर्ष, पिता – स्व. कृष्णानंदन सिंह, निवासी – कोईलवर, थाना – कोईलवर, भोजपुर, आरा (बिहार), वर्तमान पता – कोलकुसमा इंदौरी फैक्ट्री, सरायढेला, थाना – सरायढेला, जिला – धनबाद।

संजय सिंह, उम्र लगभग 48 वर्ष, पिता – केशव सिंह @ बेंचू सिंह, निवासी – ग्राम लछनपुरा, थाना – रामगढ़, जिला – भभुआ (बिहार), वर्तमान पता – एमएडीए वाटर वोट कॉलोनी, भगतडीह, थाना – झरिया, जिला – धनबाद।

डब्लू मिश्रा @ राकेश कुमार मिश्रा @ डब्लू गिरी @ मृत्युंजय गिरी, उम्र लगभग 44 वर्ष, पिता – स्व. रामप्रीत मिश्रा, निवासी – ग्राम पचपैका, थाना – उजियारपुर, जिला – समस्तीपुर (बिहार), वर्तमान पता – कोइरिबांध, थाना – झरिया, जिला – धनबाद।

अमन सिंह, उम्र लगभग 28 वर्ष (मृतक), पिता – उदयभान सिंह, निवासी – जगदीशपुर, कादीपुर, थाना – राजेसुल्तानपुर, जिला – अंबेडकर नगर (उत्तर प्रदेश)। (वाद के दौरान मृत्यु हो जाने पर पत्र संख्या 2530 दिनांक 03.12.2023 के आधार पर अभियोग समाप्त)।

 पंकज सिंह @ पंकज कुमार सिंह, उम्र लगभग 47 वर्ष, पिता – स्व. गणेश सिंह, निवासी – बुधापुर, थाना – लंभुआ, जिला – सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश)।

कुर्बान अली @ सोनू, उम्र लगभग 38 वर्ष, पिता – अंसार अली, निवासी – ग्राम मुस्तफाबाद सरैया, थाना – कादीपुर, जिला – सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश)।

सागर सिंह @ शिबू, उम्र लगभग 30 वर्ष, पिता – रामबहादुर सिंह, निवासी – मांपुर, झलिया, थाना – लंभुआ, जिला – सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश)।

 रोहित सिंह @ चंदन सिंह @ सतीश, उम्र लगभग 44 वर्ष, पिता – महिदार सिंह, निवासी – (पता अधूरा उपलब्ध)।

बिनोद कुमार सिंह, उम्र लगभग 53 वर्ष, पिता – स्व. देव कुमार सिंह, निवासी – बदरु टोला, थाना – खैरा (छपरा मुफस्सिल), जिला – छपरा (सारण), बिहार।

विवरणतिथि / विवरण
अपराध की तिथि (Date of Offence)21.03.2017
एफ.आई.आर. दर्ज होने की तिथि (Date of FIR)23.03.2017 (सुबह 06:15 बजे)
चार्जशीट दाखिल होने की तिथि (Date(s) of Charge-sheet)चार्जशीट संख्या 81/2017, दिनांक 26.06.2017;
चार्जशीट संख्या 122/2017, दिनांक 18.09.2017;
चार्जशीट संख्या 173/2017, दिनांक 20.12.2017
आरोप तय होने की तिथि (Date(s) of Framing Charges)03.01.2019 (अभियुक्त A-1 से A-6)
07.09.2018 (अभियुक्त A-7)
07.09.2018 (अभियुक्त A-8 से A-11)
साक्ष्य प्रारंभ होने की तिथि (Date of Commencement of Evidence)28.01.2019
निर्णय सुरक्षित (Date of Judgment reserved)13.08.2025
निर्णय की तिथि (Date of Judgment)27.08.2025
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