झारखंड मुक्ति मोर्चा के शीर्ष नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रहे शिबू सोरेन का सोमवार को निधन हो गया। दिग्गज आदिवासी नेता यूं तो सीएम से लेकर केंद्रीय मंत्री तक रहे, लेकिन उनका राजनीतिक सफर काफी चुनौतियों भरा रहा। शिवा उर्फ शिवलाल उर्फ शिवचरण मांझी से दिशोम गुरु बनने तक का शिबू सोरेन का सफर कई कठिनाइयों से गुजरा है।
वह पहली बार अपने गांव के बरलंगा प्रखंड से मुखिया का चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। उसके बाद 1972 में जरीडीह से विधानसभा चुनाव लड़े और हार गए। 1977 में वह टुंडी विधानसभा से लड़े, लेकिन फिर हार गए।
हालांकि, चुनावों में हारने के बाद भी वह महाजनों के खिलाफ आंदोलन की धार तेज करते रहे। इस दौरान वह जेल भी गए। उसके बाद उन्होंने संथाल को अपनी राजनीतिक जमीन के रूप में तैयार किया और वहां के हीरो बन गए। 1980 में पहली बार लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहे।
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इसके बाद वे लगातार चुनाव जीतते गए। 1989, 1991, 1996, 2004, 2009 और 2014 में भी वे सांसद चुने गए। 2002 में थोड़े समय के लिए शिबू सोरेन राज्यसभा के सदस्य भी रहे। 2004 में मनमोहन सिंह सरकार में वे कोयला मंत्री रहे।
अलग झारखंड राज्य बनने के बाद शिबू सोरेन झारखंड के तीसरे मुख्यमंत्री बने। 2 मार्च 2005 को उन्होंने पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला था, लेकिन 10 दिन बाद ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। वे 2008 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। इस बार 4 महीने 22 दिन तक उनका कार्यकाल चला। बतौर मुख्यमंत्री उनका तीसरा कार्यकाल 30 दिसंबर 2009 से 31 मई 2010 तक चला। वर्तमान में भी वह राज्यसभा सांसद थे।




