नई दिल्लीः कई महीनों तक चली भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर 1 अगस्त से 25% टैरिफ लगाने की घोषणा की। साथ ही उन्होंने रूस के साथ भारत के रक्षा और ऊर्जा संबंधों पर और सख्ती की चेतावनी दी। ट्रंप ने पहले यह टैरिफ 9 जुलाई से टालकर 1 अगस्त किया था, लेकिन अब भारत को कोई और राहत नहीं दी गई।
हालाँकि ट्रंप की यह नीति नई नहीं है, भारत की प्रतिक्रिया इस बार काफी मजबूत रही। यूरोपीय संघ और जापान जैसे देशों की तरह झुकने के बजाय भारत ने अपने मूल हितों की रक्षा को प्राथमिकता दी।
कृषि और डेयरी पर सख्त रुख
अमेरिका भारत के डेयरी बाजार तक पहुंच चाहता था, लेकिन अमेरिकी उत्पादों में मांसाहारी तत्व होने के कारण भारत ने इन्हें मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया। इसी तरह, भारतीय किसानों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए कृषि और जीएम फसलों पर भी कोई समझौता नहीं किया गया।
डिजिटल नीति और स्वास्थ्य हित सर्वोपरि
भारत ने डेटा लोकलाइजेशन पर अमेरिकी आपत्तियों को नजरअंदाज किया और जीवनरक्षक मेडिकल डिवाइस पर मूल्य नियंत्रण बनाए रखा। भारत ने साफ किया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और डिजिटल संप्रभुता से समझौता नहीं होगा।
भारत की रणनीतिक दृढ़ता
ट्रंप टैरिफ को राजनीतिक दबाव के औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं, लेकिन भारत ने इसे अस्वीकार करते हुए अपने दीर्घकालिक हितों की रक्षा की है। भारत अब व्यापार वार्ताओं में रक्षात्मक नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के साथ भाग ले रहा है।
विविध साझेदारियों की ओर कदम
भारत ने अमेरिका पर निर्भरता घटाने के लिए यूरोपीय संघ, ब्रिटेन व अन्य देशों से व्यापार संबंध मजबूत किए हैं। “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसी पहलों से भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत भूमिका निभाना चाहता है।
रास्ता आगे का
भारत और अमेरिका दोनों ही यह तनाव ज्यादा नहीं बढ़ाना चाहेंगे। अगस्त में प्रस्तावित अगली व्यापार वार्ता इस गतिरोध को सुलझाने का मौका हो सकती है। संभव है कि अमेरिका टैरिफ में ढील दे या भारत जवाबी कदम उठाए। पर जो भी हो, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी व्यापार नीति अब घरेलू हितों से निर्देशित होगी, न कि बाहरी दबावों से।





