डेस्कः मध्य प्रदेश में एक शख्स ने हाल ही में एक मजिस्ट्रेट जज पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उसे बरी करने का आश्वासन दिया था लेकिन आखिर में उसे एक मामले में दोषी ठहरा दिया गया। शख्स ने इस मामले में हाई कोर्ट में एक याचिका भी दाखिल की थी लेकिन अब हाई कोर्ट ने उसी पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगा दिया है। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि ट्रायल कोर्ट ने जज ने उसे कहा था कि उसे बचाव पक्ष के किसी गवाह की जरूरत नहीं है क्योंकि अभियोजन पक्ष के किसी भी गवाह ने उसे दोषी नहीं ठहराया था, जिसका मतलब था कि दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अमित सेठ की पीठ ने कहा कि जज के खिलाफ ऐसी शिकायत दर्ज करने का मकसद आपराधिक मामले के संबंध में निष्कर्ष प्राप्त करना प्रतीत होता है जिसका इस्तेमाल ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील में कार्यवाही को प्रभावित करने में किया जा सके। हाई कोर्ट ने कहा कि शिकायत में न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अपमानजनक आरोप लगाने का प्रयास है।
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कोर्ट ने टिप्पणी की, इस समय, मध्य प्रदेश की जिला न्यायपालिका के जज खुद को दुविधा में पाते हैं। एक ओर हाई कोर्ट है, जो सचमुच उनकी गर्दन पर चढ़कर, उनके न्यायिक आदेशों के कारण प्रशासनिक कार्रवाई का बेवजह डर पैदा करता है, जिसके परिणामस्वरूप बरी कर दिया जाता है और जमानत दे दी जाती है, और दूसरी ओर, जिला न्यायपालिका के जज को बेईमान वादियों की ऐसी अपमानजनक शिकायतों का सामना करना पड़ता है, जो जिला न्यायपालिका के न्यायाधीशों पर दबाव बनाने के लिए हाई कोर्ट की मानसिकता का फायदा उठाते हैं। यह बेहद निंदनीय है और इससे सख्ती से निपटने की जरूरत है।
कोर्ट प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट खालिद तनवीर के खिलाफ रजनीश चतुर्वेदी की तरफ से दायर की गई याचिका पर विचार कर रहा था। चतुर्वेदी को 2022 में भारतीय दंड संहिता की धारा 332 के तहत एक लोक सेवक को चोट पहुंचाने के आरोप में दोषी ठहराया गया था। चतुर्वेदी ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई इस सजा को अपीलीय अदालत में चुनौती दी। अपनी अपील के पेंडिंग रहने के दौरान चतुर्वेदी ने हाई कोर्ट में शिकायत की कि ट्रायल जज ने उन्हें बरी करने का आश्वासन देते हुए खुलेआम कहा था कि अभियोजन पक्ष के दो गवाह अपने बयान से पलट गए हैं और तीसरे गवाह से जिरह नहीं की जा सकती।
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