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बाबूलाल मरांडी के प्रदेश अध्यक्ष रहते एक बार भी नहीं हुई BJP कार्यसमिति की बैठक, ढाई साल पहले हुई थी अंतिम बार बैठक

बाबूलाल मरांडी के प्रदेश अध्यक्ष रहते एक बार भी नहीं हुई BJP कार्यसमिति की बैठक, ढाई साल पहले हुई थी अंतिम बार बैठक

रांचीः देश भर में बीजेपी संगठन में फेरबदल का दौर चल रहा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर कई राज्यों में नये प्रदेश अध्यक्ष नियुक्ति किये जाने है। कुछ राज्यों में नये प्रदेश अध्यक्ष का चयन हो गया है कई राज्यों में अभी होना बाकी है। झारखंड में भी नये प्रदेश अध्यक्ष का इंतजार हो रहा है। वर्तमान में बाबूलाल मरांडी प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष की दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे है। एक व्यक्ति एक पद के आधार पर बाबूलाल मरांडी की जगह झारखंड में नये प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा होनी है। प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर कई दावेदार माने जाते है। पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास, सांसद मनीष जायसवाल, सांसद विद्युत वरण महतो इस रेस में शामिल है।

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झारखंड बीजेपी में फिलहाल संगठन की मजबूती और संगठनात्मक चुनाव की भी प्रक्रिया चल रही है। बाबूलाल मरांडी चार जुलाई 2023 को झारखंड बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बने थे। उनके अध्यक्ष बने 2 साल हो चुका है लेकिन उनके नेतृत्व में एक बार भी प्रदेश बीजेपी के कार्यसमिति की बैठक नहीं हो पाई है। प्रदेश अध्यक्ष रहते विधानसभा चुनाव में हार के बाद एक और ऐसा रिकार्ड है जो बाबूलाल मरांडी को पीड़ा पहुंचा रहा होगा वो है एक बार भी उनके नेतृत्व में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक का नहीं होना।

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वैसे बात करें तो पिछले ढाई सालों में बीजेपी प्रदेश कार्यसमिति की बैठक नहीं हुई, यहां तक की विधानसभा चुनाव से पहले भी कार्यसमिति की बैठक नहीं हो सकी। पार्टी के संवैधानिक परंपराओं के अनुसार, प्रत्येक तीन माह में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक होनी चाहिए।अंतिम बार कार्यसमिति की बैठक 23 से 24 जनवरी 2023 को देवघर में हुआ था जिसमें तत्कालीन अध्यक्ष व वर्तमान में राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश ने इसकी अध्यक्षता की थी। इस बैठक में केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी, लक्ष्मीकांत वाजपेयी, बाबूलाल मरांडी, नागेंद्र नाथ त्रिपाठी, कर्मवीर सिंह सहित प्रदेश कार्यसमिति सदस्य, विशेष आमंत्रित सदस्य, विधायक, सांसद और जिलाध्यक्ष शामिल हुए थे।

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पार्टी के अंदरखाने में चर्चा है कि प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी की ओर से सिर्फ प्रदेश पदाधिकारियों और पार्टी के सात मोर्चा के अध्यक्षों की घोषणा की गयी है। अब तक आधिकारिक रूप से कार्यसमिति सदस्यों की घोषणा नहीं हो पाई है, ऐसे में कार्यसमिति की बैठक का होना संभव नहीं है। इससे पहले भी तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश के कार्यकाल में भी कार्यसमिति सदस्यों की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई थी। हालांकि कार्यसमिति सदस्यों की एक सूची तैयार जरूर की गई थी। कार्यसमिति बैठक की इसी सूची में शामिल सदस्यों को मेल और फोन पर बैठक में आमंत्रित किया गया था। इसको लेकर भी सवाल उठे थे और विवाद खड़ा हुआ था। वहीं अभी भी पार्टी के कई नेता अपने आप को कार्यसमिति का सदस्य बताते है।

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बाबूलाल मरांडी के लिए नई कार्यसमिति का गठन करना और उनकी बैठक बनाना पिछले दो सालों में चुनौती बनी रही। विधानसभा चुनाव में हार के बाद ये मुश्किलें और भी बढ़ गई है। आधिकारिक कार्यसमिति के बिना इसकी बैठक भी नहीं हो पाई है। पार्टी के अंदर वरिष्ठ नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्रियों की फौज है, ऐसे में कार्यसमिति में उन्हे एडजस्ट करना या तालमेल बनाना भी चुनौती बनी हुई है। पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ओडिशा के राज्यपाल का पद छोड़कर एक बार फिर से झारखंड की राजनीति में सक्रिय हो गए है। पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन जेएमएम छोड़कर बीजेपी में आ चुके है। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा भी लोकसभा चुनाव हारने के बाद राज्य की राजनीति में रिटर्न हो चुके है। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा जिनकी तस्वीर बीजेपी ने आधिकारिक रूप से कुछ दिनों पहले अपने पोस्टर लगाया था। पूर्व विधायक सीता सोरेन जो जेएमएम छोड़कर बीजेपी की ओर से लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ चुकी है, पूर्व सांसद गीता कोड़ा, पूर्व विधायक लोबिन हेम्ब्रम इन सभी के बीच संतुलन बनाते हुए कार्यसमिति में इन्हे जगह देना प्रदेश अध्यक्ष के लिए बड़ा टास्क है। ऐसे में बाबूलाल मरांडी या फिर अगर कोई नया प्रदेश अध्यक्ष जो बीजेपी को मिलेगा उसके लिए ये एक बड़ी चुनौती है। बीजेपी के अंदर की गुटबाजी का नुकसान विधानसभा चुनाव में पार्टी उठा चुकी है, ऐसे में इतने बड़े-बड़े नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देना, कार्यसमिति में जगह देना और संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है।

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हालांकि बीजेपी की ओर से कहा कि जा रहा है कि विधानसभा चुनाव के बाद पिछले सात महीने से सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है। संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। मंडल अध्यक्षों की घोषणा करने की तैयारी की जा रही है। इसके बाद जिलाध्यक्षों के चुनाव की प्रक्रिया पूरी की जायेगी। इसके बाद नये प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होगा। यानी संगठनात्मक चुनाव खत्म होने के बाद ही अब अगले प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में ही प्रदेश कार्यसमिति की बैठक होना संभव है।

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