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जिस Gandhiफिल्म की कर रहे हैं मोदी बात उसे बनना नहीं देना चाहते थे बॉलीवुड के दिग्गज,  अंतिम यात्रा में 50 हजार ‘एक्स्ट्रा’ को मिले थे 75 रुपए

प्रधानमंत्री मोदी  के इंटरव्यू के बाद Mahatma Gnadhi सुर्खियों में हैं। इस इंटरव्यू में पीएम मोदी ने एबीवी चैनल से कहा कि गांधी फिल्म बनने के बाद दुनिया ने महात्मा गांधी को जाना । पीएम के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर जबरदस्त ट्रोल हो रहे हैं पीएम मोदी । विरोधी उनपर सवाल उठा रहे हैं । अब  तक लाखों पोस्ट हो चुके हैं। कांग्रेस के राहुल गांधी समेत कई नेता पीएम मोदी के बयान पर  अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं। अपने इस इंटरव्यू में पीएम मोदी ने जिस गांधी फिल्म का जिक्र किया उसके बनने की कहानी भी दिलचस्प औऱ विवादों से घिरी है ।

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गांधी फिल्म में अंतिम यात्रा का दृश्य

 

गांधी बनाने के लिए बेलने पड़े थे पापड़

महात्मा गांधी की हत्या के 33 साल बाद बनी इस फिल्म को ब्रिटिश फिल्मकार रिचर्ड एटनबर्ग ने दिल्ली में फिल्माया था । इसे बाद में ऑस्कर से भी सम्मानित किया गया था । फिल्म बनाने में भारत सरकार ने लगभग अठारह करोड़ रुपए की मदद की थी और इसमें दौ सौ परमानेंट यूनिट लगे थे । निर्देशक रिचर्ड एडनबर्ग ने इस फिल्म को बनाने के लिए कितनी मेहनत की थी इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने चालीस बार भारत का दौरा किया था ताकि फिल्म बनाने की इजाजत मिल सके ।

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सेट और कॉस्ट्यूम की लागत

जानकर हैरानी होगी कि गांधी जी के साबरमती आश्रम और जालियांवाल बाग के सेट के निर्माण में उस वक्त चौरासी लाख रुपए लग गए थे । गांधी फिल्म के लिए जो कॉस्ट्यूम या परिधान खरीदे गए थे उसकी लागत साढ़े अठारह लाख रुपए थी । 1960-1940 के दौरान पहने जाने वाले पश्चिमी परिधानों की संख्या 650 थी । इसमें लेडीज पर्स, हैट, हैटपिन, उस वक्त के ढाई सौ जूते और सैंडिल खरीदे गए थे ।

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अंतिम यात्रा सबसे खास थी

गांधी फिल्म में उनकी अंतिम यात्रा के दौरान रियल लूक  देने के लिए रिचर्ड एटनबर्ग ने पचास हजार एक्ट्रा को इस्तेमाल किया था ।  हर किसी को 75 रुपए रोजाना के हिसाब से दिए गए थे और खाने के लिए अलग से कूपन मिलता था । भीड़ जमा करने के लिए कई टीमें लगी थी जिन्हें दिल्ली के आस-पास के गांवों में भेजकर लोगों को बुलाया गया था । जो पहली कतार में खड़े हुए उन्हें 75 रुपए मिले जो और पिछे वालों को 15 रुपए ।

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विदेश से आए थे कैटरर

खाने-पीने का भी पूरा इंतजाम किया गया था । विदेशी यूनिट के लिए लंदन से कैटरर आए थे जो वहां से डिब्बा बंद खाना लेकर आए थे जबकि  स्थानीय एक्स्ट्रा को हर दिन भारतीय खाना परोसा जाता था । मौर्या शेरेटन होटल के कूक  खाना बनाते थे । दिल्ली के अशोक होटल के सौ कमरे बुक थे।

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श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी थे कैमरामैन 

श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी के पास कैमरा की जिम्मेदारी थी । और जो लूमा क्रेन गांधी फिल्म में इस्तेमाल हुई थी वो दुनिया में सिर्फ पांच ही थी और भारत में पहली बार प्रयोग की गई थी । एटनबर्ग ने फिल्म की मंजूरी के लिए जबरदस्त पापड़ बेले । भारतीय मीडिया इस फिल्म को लेकर बहुत सारी नाकारात्मक खबरें प्रकाशित कर रही थीं। आखिरकार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रात भर जागकर स्क्रिप्ट पढ़ी और मंजूरी मिली । उस वक्त के सूचना प्रसारण मंत्री के मुताबिक स्क्रिप्ट पढ़ते वक्त इंदिरा गांधी की आंखों में कई बार आंसू आए  । आखिरकार एटनबर्ग का दो दशक पुराना और नेहरु का सपना साकार हुआ औऱ फिल्म बन पाई 

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बॉलीवुड ने किया था विरोध

गांधी फिल्म का विरोध करने के लिए बॉलीवुड के उस वक्त कई दिग्गजों ने सरकार को चिट्ठी लिखी और एटनबर्ग का विरोध किया । यही नहीं सरकार द्वारा आर्थिक मदद को लेकर भी भारी नाराजगी जताई गई थी । बहरहाल फिल्म तैयार हुई । सबसे मुश्किल हुआ आखिरी सीन में जब गांधी जी की अंतिम यात्रा में हजारों लोगों की भीड़ इस दृश्य को देखने के लिए इकट्ठा हो गई । इस सीन को फिल्माने में पांच घंटे लग गए थे

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