खूंटी की अलबीना मुंडू वर्षों से कटहल के बीज खाती है, सब्जी और दाल खाए वर्षों बीत गए;  बांस का घर -साड़ी की दीवार और है कंबल का दरवाजा 

khuti albina mundu

खूंटीः अलबीना मुंडू अपने घर में ताला नहीं लगाती  । इसलिए नहीं लगाती क्योंकि दरवाजा नहीं है । अलबीना सब्जी रोटी और भात दाल भी नहीं खाती । इसलिए नहीं खाती क्योंकि उसके पास है ही नहीं । अलबीना की उम्र 70 वर्ष होने को है । झुक कर चलती है । जंगल से चुन कर लकड़ी लाती है । जंगल के कटहल के बीज उबालती है और खा कर सो जाती है। रात में जंगली-जानवरों को रोकने के लिए बांस की चाहरदीवारी है और छत के नाम पर एसबेस्टस। दो साड़ी है एक साड़ी  पहनती है और दूसरे से दीवार बना कर घर को पूरा करती है ।

अलबीना मुंडू झारखंड की राजधानी से महज पचास किलोमीटर दूर खूंटी जिले में रहती हैं। पति नहीं है । अलबीना मुंडू का पता है कुंदा पंचायत, रुईटोला गांव में ईमली पेड़ के नीचे, खूंटी जिला । सरकार की ओर से न जाने कब कंबल मिला था उसे जाड़े की रात ओढ़ती है और गर्मियों में दरवाजे पर लटका देती है । चार ईंटो क जोड़ चूल्हा बना लिया है और उसी में कहटल के बीज उबालती रहती है । पक जाता है तो खा कर सो जाती है । घर को साफ-सुथरा रखती है । गंदगी पसंद नहीं । सरकार की योजनाएं भी अलबीना को पसंद नहीं करती हैं ।

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अलबीना के लिए सरकारी की अबुआ आवास, वृद्धा पेंशन, मुफ्त राशन और ना जाने कौन-कौन सी योजनाएं बेकार हैं । वो वोट देकर लोकतंत्र की भागीदार तो बनती है और लोकतंत्र भी उसकी गरीबी और बेबसी का हिस्सेदार बन उसके इस हाल में साल दर साल इजाफा करता रहता है। अलबीना  भगवान बिरसा मुंडा के जिले में रहती है । राजधानी रांची से महज पचास किलोमीटर दूर ।

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स्थानीय पत्रकार अजय शर्मा और देहात न्यूज के पत्रकार अजय शर्मा के मुताबिक  वे अलबीना की इस झोपड़ी के पास पहुंचें , तब अलबीना अपने चूल्हे पर कटहल का कोवा उबाल रही थीं। उसमें सिर्फ नमक था। न तेल, न हल्दी, न कोई मसाला। उन्होंने बताया कि यही उनका दिन भर का भोजन है। चूल्हे में जलती झाड़ियों के धुएं से उनकी आंखें लाल थीं, लेकिन उस जलन से ज्यादा उनकी तकलीफ उनके शब्दों में थी। वह कहती है कि दाल और सब्जी तो उन्होंने महीनों से खाया ही नहीं।

यकीन करेंगे जिस देश में हजारों-करोड़ रुपए सरकारी जश्न में यूं ही फूंक दिए जाते हैं उस मुल्क में अलबीना  मुंडू का घर भी है जहां हल्दी नहीं, तेल नहीं । पास में एक रुपया तक नहीं । दाल और सब्जी खाए हुए वर्षों हो चुके हैं  । पिछले महीने ही पीडीएस से पांच किलो अनाज तो मिलना शुरु हुआ लेकिन दाल आज तक नहीं मिली  । अनाज लाने के लिए भी झुकी कमर से लंबा सफर तय करना पड़ता है ।

खूंटी आदिवासी बहुल इलाका है । देश की राष्ट्रपति आदिवासी हैं । प्रधानमंत्री दौरा कर चुके हैं। कांग्रेस के सांसद और जेएमएम के विधायक हैं । अलबीना मुंडू को इन सब से कोई फायदा नहीं मिलता । वो कटहल उबालती है । खाती है और सो जाती है । उसके घर की फूटी छत, बांस की दीवारों से सूरज की रोशनी तो हर सुबह पहुंचती है लेकिन विकसित भारत का उजियारा कभी नहीं पहुंचता ।  हांलाकि अजय शर्मा की पहल की पर स्थानीय चेंबर ने मदद तो पहुंचाई लेकिन सरकार अब तक सो रही है ।

 

 

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