कारोबार बनकर रह गईं शादियां, दहेज को लेकर भड़का सुप्रीम कोर्ट; रद्द की जमानत

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November 29, 2025

JSSC CGL का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, हाईकोर्ट के आदेश को दी गई चुनौती

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि विवाह एक पवित्र और महान संस्था है, जो आपसी विश्वास, साहचर्य और सम्मान पर आधारित है, लेकिन दहेज की बुराई के कारण यह पवित्र बंधन दुर्भाग्य से एक कारोबारी लेन-देन बनकर रह गया है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि दहेज हत्या केवल एक व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि समग्र समाज के विरुद्ध अपराध है।

बेंच ने कहा, ‘‘यह कोर्ट इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकता कि विवाह, अपने वास्तविक स्वरूप में, आपसी विश्वास, साहचर्य और सम्मान पर आधारित एक पवित्र और महान संस्था है। हालांकि, हाल के दिनों में, यह पवित्र बंधन दुर्भाग्य से एक मात्र व्यावसायिक लेन-देन बनकर रह गया है। दहेज की बुराई को अकसर उपहार या स्वैच्छिक भेंट के रूप में छिपाने की कोशिश की जाती है, लेकिन वास्तव में यह सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदर्शित करने और भौतिक लालच को शांत करने का एक साधन बन गई है।’’

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बेंच ने यह टिप्पणी उस व्यक्ति की जमानत रद्द करते हुए की, जिस पर शादी के सिर्फ चार महीने बाद ही दहेज के लिए अपनी पत्नी को जहर देने का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति को जमानत पर रिहा करने के हाई कोर्ट के आदेश को ‘‘प्रतिकूल और अव्यावहारिक’’ पाया, क्योंकि इसमें अपराध की गंभीरता, मृत्यु से पहले दिए गए पुष्ट बयानों और दहेज हत्या की वैधानिक धारणा को नजरअंदाज किया गया था।

इसमें कहा गया है कि दहेज की सामाजिक बुराई न केवल विवाह की पवित्रता को नष्ट करती है, बल्कि महिलाओं के व्यवस्थित उत्पीड़न और पराधीनता को भी बढ़ावा देती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘‘दहेज हत्या की घटना इस सामाजिक कुप्रथा की सबसे घृणित अभिव्यक्तियों में से एक है, जहां एक युवती का जीवन उसके ससुराल में ही समाप्त कर दिया जाता है और वह भी उसकी किसी गलती के कारण नहीं, बल्कि केवल दूसरों के अतृप्त लालच को संतुष्ट करने के लिए।’’

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अदालत ने कहा कि इस तरह के जघन्य अपराध मानवीय गरिमा की जड़ पर प्रहार करते हैं और अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता और सम्मानजनक जीवन की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करते हैं।

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