कोलकाता हाईकोर्ट के जज अभिजीत मजूमदार ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन न्यायिक सेवा से इस्तीफा देकर राजनीति में आने का ऐलान कर दिया। वे बीजेपी में शामिल होंगे। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा की बीजेपी ने उन्हें संपर्क किया और वे भी बीजेपी के संपर्क में थे । पूर्व जज अभिजीत मजूमदार ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस पर हमला किया और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए । माना जा रहा है कि वे लोकसभा चुनाव लडेंगे । हाल के दिनों में किसी जज द्वारा पद पर रहते हुए इस्तीफा देना और राजनीति में आने की ये पहली घटना है । हांलाकि ऐसा नहीं है कि देश के इतिहास में ऐसा पहले नहीं हुआ है कि जब जज ने इस्तीफा देकर राजनीति करने का फैसला किया हो ।
इससे पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश कोका सुब्बा राव ने 30 जून 1966 को पदभार संभाला था और उन्होंने एक साल के अंदर ही और अपने कार्यकाल के खत्म होने के तीन साल पहले चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के पद से इस्तीफा दे दिया था । बाद में स्वतंत्र पार्टी ने उन्हें राष्ट्रपति के चुनाव में प्रत्याशी बनाया । हांलिक कांग्रेस के जाकिर हुसैन से वे एक लाख से ज्यादा वोटों से हार गए ।
1983 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बहारुल इस्लाम ने भी रिटायरमेंट से तीन महीने पहले अपने पद से इस्तीफा देकर असम के बारपेटा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा । हांलाकि बहारुल इस्लाम का राजनीति से जुड़ाव जज बनने से पहले से था । १९४८ से १९५६ तक वे असम सोशलिस्ट पार्टी के एक्जीक्यूटिव मेंबर रह चुके थे । 1956 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर लिया था । बाद में कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजा । 1972 में राज्यसभा से उन्होंने इस्तीफा दिया और फिर उन्हें गुवाहाटी हाईकोर्ट मे जज बना कर भेजा गया । 4 दिसंबर 1980 को बहारूल इस्लाम को सुप्रीम कोर्ट में जज बना दिया गया। 1983 में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस से बारपेटा से चुनाव लड़ने के लिए भेजा । हांलाकि बारपेटा में हिंसा की वजह से चुनाव नहीं हो सका था ।








