पूर्व मुख्यमंत्री और CPI(M) संस्थापक वी. एस. अच्युतानंदन का 102 वर्ष की उम्र में निधन, हेमंत सोरेन ने दी श्रद्धांजलि

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July 21, 2025

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तिरुवनंतपुरम : केरल की राजनीति में संघर्ष और सिद्धांत का प्रतीक माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री एवं माकपा (CPM) के संस्थापक नेताओं में से एक वी. एस. अच्युतानंदन का सोमवार शाम निधन हो गया। वह 102 वर्ष के थे। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे अच्युतानंदन को 23 जून को हृदयघात के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां आज उनका निधन हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत तमाम नेताओं ने उनके निधन पर शोक संदेश दिया है ।

 

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2006-2011 तक मुख्यमंत्री रहे

वी. एस. अच्युतानंदन ने 2006 से 2011 तक केरल के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। इसके बाद 2016 में जब वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) फिर से सत्ता में आया, तो उन्हें कैबिनेट रैंक के साथ प्रशासनिक सुधार आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

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1940 से वामपंथी आंदोलन से जुड़े वीएस

20 अक्टूबर 1923 को अलाप्पुझा जिले के पन्नप्रा के वेलिक्ककथु घराने में शंकरण और अक्कमम्मा के घर जन्मे अच्युतानंदन 1940 से ही वामपंथी आंदोलन से जुड़े थे। वे अलाप्पुझा डिवीजन सचिव, जिला सचिव और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की राष्ट्रीय समिति के सदस्य भी रहे।

1964 में पार्टी विभाजन के बाद वह सीपीएम के केंद्रीय समिति के सदस्य बने और 1985 से 2009 तक पोलित ब्यूरो के सदस्य भी रहे। उन्होंने तीन बार पार्टी के राज्य सचिव और दो बार विपक्ष के नेता के रूप में भी काम किया।

चुनावी संघर्ष और उपलब्धियाँ

वी.एस. ने 1965 में अंपलाप्पुझा विधानसभा सीट से अपना पहला चुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस के के.एस. कृषणकुरुप से हार गए। 1967 में उन्होंने कांग्रेस के एम. अच्युतन को हराकर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया और 1970 में भी चुनाव जीता।

हालांकि, 1977 में आरएसपी के के.के. कुमारपिल्लई से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लंबे अंतराल के बाद 1991 में वह मारीरिकुलम से फिर जीते, लेकिन 1996 में कांग्रेस के पी.जे. फ्रांसिस से हार गए, जिसने पार्टी में गहरी हलचल मचा दी। 2001 से वह मलमपुझा विधानसभा सीट से लगातार विधायक रहे।

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पारिवारिक जीवन

उनकी पत्नी वसुमति, अलाप्पुझा मेडिकल कॉलेज में सेवानिवृत्त मुख्य नर्स थीं। उनके दो बच्चे हैं — डॉ. वी.वी. आश और डॉ. वी.ए. अरुणकुमार।

वी. एस. अच्युतानंदन का निधन न केवल केरल बल्कि पूरे भारत की वामपंथी राजनीति के लिए एक अपूरणीय क्षति है। सिद्धांत, सादगी और संघर्ष से भरा उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।

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