पलामू में DSP पर बेरहमी से पिटाई का आरोप, मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर चोट लगने की पुष्टि

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June 24, 2026

पलामू में DSP पर बेरहमी से पिटाई का आरोप, मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर चोट लगने की पुष्टि

पलामूः चैनपुर के रामपुर गोलीकांड के मुख्य आरोपी मंटू सिंह के साथ पुलिस हिरासत में मारपीट करने का परिजनों ने आरोप लगाया है। मंटू सिंह के परिजनों ने आरोप लगाया है कि पुलिस रिमांड में डीएसपी राजेश यादव ने मंटू सिंह को बुरी तरह से पीटा है। इससे उनके कमर के निचले हिस्से में गंभीर चोट आयी हैं। कमर के नीचे पीछे का हिस्सा पूरी तरह सूज गया है। पीछे का हिस्सा लाल व काला रंगा का हो गया है।
मेडिकल रिपोर्ट में चोट की पुष्टि का दावा
मंटू सिंह के परिवार का दावा है कि मेदिनी राय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एमएमसीएच) की जांच रिपोर्ट में भी शरीर के पिछले हिस्से में चोट लगने की पुष्टि हुई है। परिजनों के मुताबिक डॉक्टरों ने इलाज के लिए दवाएं भी लिखी हैं, जिनमें साइक्लोपारा टैबलेट शामिल है। उन्होंने कहा कि न्यायिक हिरासत में लिए गए किसी भी व्यक्ति की नियमानुसार मेडिकल जांच कराई जाती है और इसी प्रक्रिया के दौरान चोट के निशान सामने आए हैं।एमएमसीएच के रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हुई है कि उसे पीछे के हिस्से में काफी चोट लगी है।
डीएसपी ने आरोपों को बताया झूठा
इधर, सदर डीएसपी राजेश यादव ने कहा कि उन पर झूठा आरोप लगाया गया है। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह झूठे हैं और मामले को कमजोर करने के उद्देश्य से इस प्रकार के आरोप लगाए जा रहे हैं। डीएसपी ने कहा कि इस मामले में उनकी कोई संलिप्तता नहीं है और तथ्यों के विपरीत बातें फैलायी जा रही हैं।
नौ जून को किया था आत्मसमर्पण
परिजनों के अनुसार, मंटू सिंह ने नौ जून को अदालत में आत्मसमर्पण किया था।इसके बाद चैनपुर थाना पुलिस ने 22 जून को उसे 24 घंटे के लिए रिमांड पर लिया। आरोप है कि पूछताछ के दौरान रात में उसकी बेरहमी से पिटाई की गई। इतना ही नहीं, उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित भी किया गया। परिजनों का कहना है कि मारपीट के कारण कमर के नीचे का पिछला हिस्सा पूरी तरह सूज गया है। संबंधित हिस्से पर लाल और काले रंग के निशान भी दिखाई दे रहे हैं।
मानवाधिकार आयोग और हाईकोर्ट जाने की तैयारी
मंटू सिंह के परिजनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जरूरत पड़ी तो वे इस मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और झारखंड हाईकोर्ट तक ले जाएंगे। परिजनों ने इसे कथित कस्टोडियल टॉर्चर का मामला बताते हुए दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि हिरासत में किसी भी व्यक्ति के साथ अमानवीय व्यवहार कानून और मानवाधिकार दोनों के खिलाफ है।

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