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Gi टैग की जंग में झारखंड फिसड्डी, चींटी की चटनी तक ओड़िशा ने छीनी, 547 उत्पादों में झारखंड के सिर्फ सोहराय पेटिंग का नाम

Gi tagged

झारखंड से सटे राज्य ओड़िशा का चीटी का चटनी को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन टैग मिल गया । Gi टैग किसी राज्य या स्थान विशेष के लिए उसकी पहचान के तौर पर जाना जाता है ।  नए साल की शुरुआत में ओडिशा  की चींटी की चटनी को Gi टैग मिल गया । Gi टैग के जरिए अब जब भी चींटी की चटनी की बात सामने आएगी ओडिशा का जिक्र आना तय है । ज्योग्राफिकल इंडिकेशन टैग मिलना किसी भी राज्य के लिए गौरव की  बात होती है इससे उस राज्य के उत्पादों की साख बढ़ती है, , कला-संस्कृति, खान-पान और प्राकृतिक संसाधनों की खासियत को एक खास भौगोलिक पहचान मिलती और अर्थव्यवस्था को मजबूती भी मिलती है ।

झारखंड के सिर्फ 1 उत्पाद को जीई टैग

मगर जीई टैग की लड़ाई में झारखंड कहां है ये जानकर आपको हैरानी भी होगी और अफसोस भी । झारखंड के केवल एक उत्पाद सोहराई पेंटिंग को जीआई टैग मिला है । जी हां सुनकर हैरानी होगी क्योंकि भारत के सभी राज्यों को
मिलाकर कर 547 चीजों को जीआई टैग मिल चुका है जिसमें झारखंड की सिर्फ एक चीज है और वो है सोहराई पेटिंग ।

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धुस्का,रूगडा,डूंबू का क्या होगा ?

अब झारखंड का धुस्का, डुंबू, दाल पिठ्ठा, रुगड़ा, खुखड़ी (मशरूम) छिलका रोटी , बांस का अचार, फुटकल, कोईनार साग, सनई फूल का भर्ता, तसर सिल्क  जैसी चीजों के नाम आप भूल ही जाइए क्योंकि जिन उत्पादों से झारखंड की पहचान है उसे जीआई टैग दिलाने की कोशिश में राज्य की सरकार और कारोबारी पूरी तरह विफल रहे हैं । यहां तक की जिस चींटी की चटनी को ओड़िशा के मयूरभंज को जीआई टैग मिल गया उसे झारखंड में भी खूब खाया जाता है। स्थानीय बाजारों में आपने भी कई बार देखा होगा । मगर ओड़िशा ने बाजी इसलिए मार ली क्योंकि वहां के लोग और सरकार की जागरुकता ने चींटी की चटनी जैसी उस चीज को जीआई टैग दिला दिया जिसे देख गैर आदिवासी नाक भौं सिकोड़ते हैं ।

कैसे मिलता है जीई टैग
बहरहाल आपको बता दें कि ज्योग्राफिकल इंडिकेशन देने का काम करता है वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय का प्रोमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड विभाग । मिसाल के तौर पर नागपुर और तिरुपति को ले तो जेहन में संतरा और लड्डू ही आता है । ऐसा इसलिए क्योंकि नागपुर को संतरे और तिरुपति को लड्डू के ज्योग्राफिकल इंडिकेशन टैग मिला हुआ है । नागपुर के किसानों को इससे उनके उत्पादों की मार्केटिंग में जबरदस्त मदद मिलती है । अब सवाल ये उठता है कि ज्योग्राफिकल इंडिकेशन टैग मिलता कैसे है और कौन इसके लिए अप्लाई कर सकता है । वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के मुताबिक कोई भी कारोबारी संगठन, संस्था, या संघ इसके लिए आवेदन दे सकता है , बस इसके लिए उत्पाद या आइटम की खासियत, ऐतिहासिक रिकॉर्ड और कैसे यह प्रोडक्ट बनता है कि जानकारी देनी होती है । ऐसा नहीं कि Gi टैग किसी लोकप्रिय उत्पादों को ही मिल सकता है कि बल्कि ये तो किसी स्थान की खास चीजों को दिया जा सकता है बशर्ते इसकी यूनिकनेस हो ।

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तमिलनाडु सबसे आगे
Gi टैग की दौड़ में सबसे आगे है तमिलनाडु जिसके 61 उत्पादों को Gi टैग मिल चुका है, बिहार के सिर्फ 11चीजों को Gi टैग मिला है जबकि झारखंड से सिर्फ एक उत्पाद है । उत्तर प्रदेश के 5, , कर्नाटक के 48, केरल के 39 पश्चिम बंगाल के 27, उत्तराखंड के 27 छत्तीसगढ़ के 7 उत्पादों को Gi टैग के जरिए पूरी दुनिया में अपनी पहचान मिल रही है ।

माँदर को मिलेगा जीआई टैग?

झारखंड के व्यापारियों, सामाजिक संगठनों और सरकार को चाहिए राज्य की खास चीजों को अलग पहचान मिले ताकि राज्यवासियों को गौरव का मिल सके ।  हांलाकि झारखंड का वाद्य यंत्र मांदर के लिए Gi टैग के लिए आवेदन दिया गया है मगर अभी तक लंबित है ।

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