रांचीः जेपीएससी की विभिन्न परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, ओएमआर शीट में हेराफेरी और मेरिट लिस्ट में धांधली की जांच कर रही सीआईडी ने अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी है। जांच में सबसे सनसनीखेज खुलासा जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष एल ख्यांग्ते के गोपनीय दफ्तर से हुआ है। सीआईडी ने 9 अगस्त 2026 को उनके कार्यालय में छापेमारी की थी, जहां एक अलमारी की तलाशी लेने पर फॉरेस्ट रेंज अफसर परीक्षा के आठ अभ्यर्थियों के मूल एडमिट कार्ड बरामद किए गए। इन प्रवेश पत्रों पर बचनदेव कुमार वर्मा, रंजन कुमार, आशीष कुमार, धनेश्वर प्रसाद वर्मा, रूबी कुमारी, शशिकांत, आलोक रंजन कुमार और विकास कुमार के नाम दर्ज थे।
सीआईडी ने कोर्ट को सौंप साक्ष्यों में स्पष्ट किया है कि एल ख्यांग्ते का कंप्यूटर ऑपरेटर धमेंद्र कुमार केवल डेटा एंट्री का काम नहीं संभाल रहा था। वह गोपनीय कार्यालय में कार्यालय प्रधान का दायित्व निभा रहा था। फरवरी 2025 में जब एल ख्यांग्ते आयोग के अध्यक्ष बने, तब धमेंद्र की स्थिति पूरी तरह बदल गई। वह आयोग के उच्चाधिकारियों और बाहर सक्रिय दलालों के बीच का मुख्य सिंडिकेट लीडर बन बैठा। जांच में सामने आया कि उसने परीक्षा संचालन से जुड़ी दागी व काली सूची में आने योग्य एजेंसियों से संपर्क साधकर करोड़ों की उगाही की। सीडीआर के विश्लेषण से साबित हुआ है कि धमेंद्र सीधे तत्कालीन अध्यक्ष ख्यांग्ते के संपर्क में था और महज दो साल के भीतर दोनों के बीच 267 बार व्यक्तिगत बातचीत दर्ज की गई। गिरफ्तारी के समय साक्ष्य नष्ट करने की नीयत से धमेंद्र ने अपना मोबाइल फोन फर्श पर पटक कर तोड़ डाला था, ताकि डिजिटल चैट्स और सिंडिकेट के नंबर फॉरेंसिक जांच से बचाए जा सकें।
रेट कार्ड फिक्सः एफआरओ 40 लाख, एसीएफ 50 लाख रुपए
सीआईडी की चार्जशीट के अनुसार, धमेंद्र ने एफआरओ परीक्षा के आठ अभ्यर्थियों और एसीएफ परीक्षा के सात अभ्यर्थियों के रोल नंबर परीक्षा संचालन एजेंसी मेसर्स टीडीपीएल के निदेशक सतपाल सिंह को सीधे मुहैया कराए थे। जांच में पाया गया कि ये सभी 15 अभ्यर्थी परीक्षा परिणाम में सफल घोषित हुए। सीआईडी ने बताया कि धमेंद्र को ये क्रमांक कोचिंग शिक्षक रवि शंकर ने सौंपे थे। एफआरओ के लिए प्रति अभ्यर्थी 40 लाख रुपए और एसीएफ के लिए प्रति अभ्यर्थी 50 लाख रुपए का सौदा हुआ था।
एग्जाम सेंटर से बाहर रातू के फ्लैट में लिखी गई कॉपियों
सीआईडी के मुताबिक, शिवांगन की पाठशाला नामक कोचिंग के निदेशक संजीत कुमार ने आयोग के सिंडिकेट के साथ सांठगांठ कर एफआरओ मुख्य परीक्षा में छह अभ्यर्थियों की उत्तर-पुस्तिकाएं परीक्षा केंद्र से बाहर निकाल ली थीं। इन कॉपियों को रांची के बाहरी इलाके रातु स्थित एक निजी मकान में टेबल पर बैठकर विशेषज्ञों से अलग से लिखवाया गया। इसके बाद इन कॉपियों को दोबारा सीलबंद बंडलों में जमा करवा दिया गया, जिससे ये सभी छह अभ्यर्थी मेरिट लिस्ट में शीर्ष पर पहुंच गए।
आयोग के सदस्य के पीए की सीधी सेटिंग, इंटरव्यू में 80 अंक दिलावाए
चार्जशीट के अनुसार, कई अभ्यर्थियों की सीधी सेटिंग जेपीएससी की तत्कालीन सदस्य अजिता भट्टाचार्य के माध्यम से की गई थी। कोचिंग संचालक आदित्य पांडेय के जरिए अजिता भट्टाचार्य के निजी सहायक ब्रज कुमार राम को मनीष कुमार नामक अभ्यर्थी को पास कराने का जिम्मा मिला था। ब्रज कुमार ने अपनी पहुंच का इस्तेमाल करते हुए इंटरव्यू बोर्ड से मनीष कुमार को 80 अंक दिलवाए, जिससे वह अंतिम रूप से चयनित हो गया। इस काम के एवज में ब्रज कुमार को 5 लाख रुपए नकद मिले। इसके अलावा आदित्य पांडेय ने चार अन्य अभ्यर्थियों के रोल नंबर भी ब्रज कुमार को 20 लाख रुपए प्रति अभ्यर्थी की दर से सौंपे थे।
वेतन महज 31 लाख रुपए, खातों में 1.05 करोड़ रुपए मिले
सीआईडी ने ब्रज कुमार राम के तीन बैंक खातों की वित्तीय फॉरेंसिक जांच की। एक जनवरी 2024 से दो अक्टूबर 2026 के बीच इन खातों में कुल 1711 बार वित्तीय लेनदेन दर्ज किए गए। इस दौरान खातों से 1.05 करोड़ रुपए का रोटेशन हुआ। इस पूरी अवधि में उसका वैध सरकारी वेतन महज 31.33 लाख रुपए था।
कमीशनखोरी का तय फॉर्मूलाः 10 प्रतिशत अध्यक्ष, 5 प्रतिशत श्वेता और 01 प्रतिशत धमेंद्र
सीआईडी के मुताबिक जेपीएससी में एजेंसियों के चयन और बिल पास करने के बदले कमीशन की दरें निर्धारित थीं। तत्कालीन अध्यक्ष एल ख्यांग्ते का कुल बिलिंग राशि का 10 प्रतिशत सीधा हिस्सा था। उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता कुमारी गुप्ता का कुल बिलिंग का 5 प्रतिशत हिस्सा था। कंप्यूटर ऑपरेटर धमेंद्र कुमार को फाइलों की प्रोसेसिंग और समन्वय के लिए एक प्रतिशत हिस्सा दिया जाता था।
CID द्वारा जुटाए गए दस्तावेजों और बयानों से यह स्पष्ट हो गया है कि किस प्रकार चुनिंदा अधिकारियों और बिचौलियों ने मिलकर पूरी चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया और अपने चहेतों को लाभ पहुंचाया। 5 जून 2025 को श्वेता गुप्ता की नोटशीट पर TDPL को L1 बताकर नामित करने की अनुशंसा की गई, जिस पर अध्यक्ष ने उसी दिन मुहर लगा दी। जब नियमित परीक्षा नियंत्रक अवकाश पर थे, तब प्रभारी श्वेता गुप्ता द्वारा TDPL को नामांकन पत्र, प्रश्न-पत्र, OMR और कोडिंग-डिकोडिंग का कार्य सौंप दिया गया। जब श्वेता गुप्ता का स्थानांतरण किया जा रहा था, तब अध्यक्ष ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर उनके तबादले को कम से कम पाँच महीने रोकने का आग्रह किया और इस अवधि में भी TDPL के अनुबंध का विस्तार कराया गया। OMR स्कैनिंग के बाद उसी दिन स्ट्रॉन्ग रूम लौटाने के नियम का पालन नहीं किया गया। तत्कालीन उप-परीक्षा नियंत्रक सरोजनी रजनी तिर्की ने गड़बड़ी की जानकारी मिलने पर 14वीं JPSC की फाइल पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था, लेकिन बाद में अध्यक्ष के दबाव में उन्हें झुकना पड़ा।
जांच में क्या हुआ खुलासा
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि आयोग के भीतर बिचौलियों का एक मजबूत नेटवर्क सक्रिय था। धर्मेंद्र कुमार, जो कार्यालय प्रधान, मुख्य सचिव के आवासीय कार्यालय से जुड़ा था, ने बिचौलिए की भूमिका निभाते हुए TDPL और Binsys जैसी एजेंसियों को इम्पैनल कराया और इसके बदले भारी पैसे लिए। धर्मेंद्र द्वारा FRO और ACF परीक्षा में अभ्यर्थियों का चयन और पेपर आउट कराने के लिए TDPL के निदेशकों पर लगातार दबाव बनाया जाता था। एल ख्यांग्ते के आवासीय कार्यालय से FRO मेंस के 8 अभ्यर्थियों के एडमिट कार्ड बरामद हुए। इसके अलावा धर्मेंद्र ने रवि मास्टर को पैसे देकर अभ्यर्थियों के रोल नंबर सत्यपाल को दिलाए, जिससे वे सभी सफल हुए।
CID की जांच में यह बात सामने आई है कि आयोग द्वारा जिन एजेंसियों का चयन किया गया, उनकी प्रतिस्पर्धा पूरी तरह से क्रिएटेड और फर्जी थी। ALPS Solutions और NAIVE Assessment नामक दोनों कंपनियों के निदेशक एक ही व्यक्ति गौरव भुटानी थे। यहां तक कि ALPS की ईमेल आईडी भी goravabc@gmail.com दर्ज पाई गई। इसी तरह अध्ययन, नालंदा IT लैब्स और Binsys जैसी कंपनियों के निदेशक के रूप में अरुण कुमार का नाम सामने आया। गौरव भुटानी ने CID को दिए अपने बयान में स्वीकार किया कि उनकी कंपनियों ने JPSC की किसी भी परीक्षा के लिए कोई प्रस्ताव दिया ही नहीं था। इसके बावजूद, TDPL के लखनऊ कार्यालय से ALPS/JPSC/2025-26/28 संदर्भ वाले प्रस्ताव-पत्र जब्त किए गए, जिससे यह साबित होता है कि ALPS के नाम पर आने वाले सभी प्रस्ताव वास्तव में TDPL के पास ही थे। दस्तावेजों के मुताबिक तत्कालीन समय में नियमों को ताक पर रखकर चहेती एजेंसियों को टेंडर दिए गए और अधिकारियों द्वारा अपनी पसंद के परीक्षा नियंत्रक और कर्मियों पर दबाव बनाया गया।







