रांचीः झारखंड के आदिवासी लोकजीवन, पर्व-त्योहार और अखरा से जुड़े मांदर को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई टैग) मिल गया है। भारत सरकार की जीआई रजिस्ट्री, चेन्नई में इसे भागौलिक संकेतक का दर्जा दिया है। पारंपरिक लाल और नगड़ा मिट्टी से तैयार इस लोकवाद्य को अब कानूनी और भागौलिक पहचान मिल गई है।


मांदर को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया 2021 से चल रही थी। दूसरे राज्यों में इससे मिलते-जुलते वाद्ययंत्र होने के कारण पंजीकरण की प्रक्रिया लंबित थी। मांदर को जीआई टैग दिलाने में गुमला के तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी ने अहम भूमिका निभाई। स्थानांतरण के बाद भी उन्होंने इस प्रयास को जारी रखा और मांदर को झारखंड की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के रूप में जीआई मान्यता दिलाने की प्रक्रिया से जुड़े रहे। करीब पांच वर्षों के प्रयास, दस्तावेजी प्रमाण और प्रक्रियागत चुनौतियों के बाद यह उपलब्धि हासिल हुई है।
राष्ट्रपति को मांदर देते गुमला के तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी

जीआई आवेदन में मांदर की विशिष्ट बनावट, स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक निर्माण तकनीक, इसकी ध्वनि और झारखंड के जनजातीय जीवन से इसके गहरे सांस्कृतिक संबंध को प्रमाणित किया गया। इसके लिए 1915 से 1940 के बीच के ऐतिहासिक दस्तावेजों और विभिन्न पुस्तकों एवं अभिलेखों को भी आधार बनाया गया। झारखंड में मांदर केवल वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन और लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। सरहुल, करमा समेत विभिन्न पर्व-त्योहारों और पारंपरिक नृत्य में मांदर की थाप लोगों को जोड़ती है।

राज्य में इसके विभिन्न पारंपरिक रूप भी प्रचलित हैं। जीआई टैग मिलने से मांदर बनाने वाले पारंपरिक कारीगरों को अपनी कला की विशिष्ट पहचान स्थापित करने में मदद मिलेगी। जीआई व्यवस्था किसी क्षेत्र विशेष से जुड़े उत्पाद की प्रामाणिकता और विशिष्ट भौगोलिक पहचान को संरक्षण देती है। इससे पारंपरिक शिल्प को बाजार और पहचान मिलने की संभावनाएं भी बढ़ती हैं।
मांदर के जीआई टैग के साथ झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। इससे पहले सोहराय-खोवर चित्रकला और कलाकंद समेत राज्य के कई पारंपरिक उत्पादों को जीआई पहचान मिल चुकी है।





