रांचीः सिमडेगा से जुड़े एक बहुचर्चित मामले में कांग्रेस विधायक भूषण बाड़ा समेत पांच आरोपियों को झारखंड हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। यह मामला महिला का दुपट्टा खींचने, अभद्र व्यवहार व मारपीट करने से जुड़ा है। हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने उनकी याचिका सुनवाई के बाद खारिज कर दी। भूषण बाड़ा, उनकी पत्नी जोसीमा खाखा, जसिंता मिंज, समीर मिंज और एमा बाड़ा ने याचिका दायर कर निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी।
अदालत ने कहा कि पहले से चल रहे शिकायतवाद को केवल इस आधार पर समाप्त पहीं किया जा सकता है कि बाद में दर्ज एक अन्य पुलिस केस में आरोपियों को राहत मिल चुकी है। अदालत ने कहा कि रिकार्ड पर मौजूद गवाहों के बयान से प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
अदालत ने माना कि शिकायतकर्ता के कपड़े खींचने और दुपट्टा हटाने संबंधी आरोप गवाहों ने भी अपने बयान में दोहराये हैं। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा आईपीसी की धारा 354 जोड़ना कानून के अनुरूप है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यहां वर्तमान शिकायत मामला पहले से लंबित था, इसलिए उसे रद्द नहीं किया जा सकता। यह मामला एमपी-एमएलए कोर्ट से जुड़ा है। याचिका में एमपी-एमएलए केस संख्या 05/ 2021 की पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मां की गयी थी। यह मामला सिमडेगा की शिकायत वाद संख्या-68/ 2018 से संबंधित है।
इससे पहले याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया था कि इसी घटना को लेकर 2019 में सिमडेगा महिला थाना में भी प्राथमिकी दर्ज हुई थी। उस मामले में हाईकोर्ट की समन्वय पीठ ने वर्ष 2023 में पूरी कार्यवाही रद्द कर दी थी, इसलिए वर्तमान शिकायत मामला चलाना डबल जियोवार्डी यानी एक ही घटना में दोबारा मुकदमा चलाने जैसा है। यह भी कहा गया कि बाद में धारा 354 जोड़ने से उन्हें नुकसान हुआ है, क्योंकि ऐसा ही आरोप दूसरे मामले में भी था, जिसे पहले ही खत्म किया जा चुका है। वहीं राज्य सरकार व शिकायतकर्ता पक्ष ने अदालत में कहा कि पहले से चल रहे मामले को खत्म करने का कोई आधार नहीं बनता है।
क्या है मामलाः पीड़ित ने आरोप लगाया था कि दो जनवरी 2018 को वह अपनी परिचित के विवाह की जानकारी देने उसके गांव गयी थीं। आरोप है कि गांव पहुंचने पर मुखिया भूषण बाड़ा समेत अन्य आरोपियांें ने उसके साथ अभद्र व्यवहार किया। गाला-गलौज और मारपीट की। उसके कपड़े खींचे गये और अपमानित किया गया। इस मामले में सिमडेगा एसडीजेएम की अदालत ने आईपीसी की धारा 323, 504, 506 और 342 के तहत प्रथम दृष्टया मामला पाते हुए संज्ञान लिया था। बाद में गवाहों के बयान के आधार पर अदालत ने धारा 354 भी जोड़ दी।


