रांचीः सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड पुलिस के पूर्व सिपाही रंजन कुमार की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ का फैसला रद्द कर दिया है। कोर्ट ने माना कि रंजन कुमार ने दो अलग-अलग नामों और दस्तावेजों के आधार पर झारखंड और बिहार पुलिस में नौकरी हासिल की थी। कोर्ट ने इस मामले में आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का भी निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए अमानुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने यह फैसला झारखंड सरकार की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुनाया। झारखंड सरकार ने हाईकोर्ट के 25 अगस्त 2022 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें रंजन कुमार को राहत देते हुए उसकी बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए विभागीय कार्यवाही को वैद्य माना है। पीठ ने माना कि विभागीय अधिकारियों ने उपलब्ध दस्तावेजों, तस्वीरों और रिपोर्ट के आधार पर उचित निष्कर्ष निकाला था। पीठ ने कहा कि पुलिस जैसी अनुशासित सेवा में ईमानदारी और सत्यनिष्ठा सबसे महत्वपूर्ण है।
फर्जी पहचना और जाली दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हासिल करना बेहद गंभीर कदाचार है। विभागीय जांच के बाद 20 अगस्त 2010 को रंजन कुमार को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इसके बाद उसने अपील और पुनिर्विचार याचिका दायर की, लेकिन दोनों खारिज हो गया। बाद में उसने झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। एकल पीठ ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन खंडपीठ ने उसे राहत दे दी थी। इस फैसले के खिलाफ झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।
फॉरेंसिंक जांच में पकड़ा गया फर्जीवाड़ा, तो हुई कार्रवाई
रिकार्ड के अनुसार, रंजन कुमार की नियुक्ति 18 मई 2005 को झारखंड पुलिस में सिपाही के पद पर हुई थी। वह गढ़वा जिले में तैनात था। दिसंबर 2007 में छुट्टी पर जाने के बाद वह ड्यूटी पर नहीं लौटा। आरोप है कि इसी दौरान उसने बिहार पुलिस में संतोष कुमार नाम से दूसरी नौकरी हासिल कर ली थी। बिहार पुलिस में उसने अपना नाम संतोष कुमार और पिता का नाम कामता शर्मा बताया था, जबकि झारखंड पुलिस में वह रंजन कुमार, पिता कामता सिंह के नाम से कार्यरत था। जांच में दोनों जगह इस्तेमाल की गई तस्वीरें एक व्यक्ति की पायी गयी। फिंगरप्रिंट, बायोमैट्रिक रिकार्ड और तस्वीरों में आधार पर पुष्टि हुई है रंजन कुमार और संतोष कुमार एक ही व्यक्ति हैं। जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पिता के नाम और उपनाम में बदलाव कर अलग पहचान बनाने की कोशिश की गई थी।
बिहार पुलिस की नियुक्ति भी रद्द
पीठ ने अपने आदेश में 26 दिसंबर 2007 को बिहार पुलिस में संतोष कुमार के नाम से हुई नियुक्ति भी रद्द कर दी। पीठ ने कहा कि यह मामला केवल विभागीय अनुशासन का नहीं, बल्कि धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जीवाड़े का भी है। पीठ ने बिहार और झारखंड के डीजीपी को निर्देश दिया है कि मामले की जांच कर कानून के अनुसार आपराधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाये।


