रांचीः असम में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने एक बार फिर से सत्ता में वापसी की है। हिमंता बिस्व सरमा के नेतृत्व में बीजेपी ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया है। कांग्रेस का प्रदर्शन 2021 से भी खराब रहा है, स्थिति से रही कि कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री के चेहरे गौरव गोगई खुद विधानसभा का चुनाव हार गए। यहां तीसरी शक्ति के रूप में जेएमएम उभरती हुई नजर आ रही है। जेएमएम ने यहां 16 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और उसके उम्मीदवार दो सीटों पर बीजेपी गठबंधन को चुनौती देते हुए दूसरे नंबर पर रही। सात सीटों पर उसके उम्मीदवार को 15 हजार से ज्यादा वोट मिले। जेएमएम ने जिन सीटों पर उम्मीदवार उतारे वहां कम से कम हर सीट पर वो तीसरे नंबर पर रही।
पहली बार असम में चुनाव लड़ रही झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रदर्शन से उसके केद्रीय अध्यक्ष और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन संतुष्ट नजर आ रहे है। उन्होंने असम में जेएमएम के प्रदर्शन और जनता से मिले उन्हें समर्थन पर आभार जताते हुए अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपनी भावनाओं को साझा करते हुए लिखा कि असम की महान जनता को जोहार एवं हृदय से आभार।
बहुत ही सीमित समय और संसाधन में जो कुछ भी किया जा सका, वह आप सभी के सहयोग, विश्वास और सक्रिय भागीदारी के बिना संभव नहीं था। इस संघर्ष में जिस तरह से आपने हमारा साथ दिया, वह न केवल सराहनीय है, बल्कि हमारे लिए अत्यंत हौसला बढ़ाने वाला भी है। आपका यह समर्थन हमारे लिए शक्ति, प्रेरणा और नई ऊर्जा का स्रोत है।
असम में चुनाव लड़ने का फैसला झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के लिए केवल राजनीतिक विस्तार नहीं था, बल्कि यह वहां के आदिवासी-दलित-अल्पसंख्यक समाज के हक, सम्मान और पहचान की लड़ाई को मजबूत आवाज देने का एक ठोस कदम भी था। राज्य में आदिवासियों की दयनीय स्थिति – ST का दर्जा न मिलना, चाय बागान के मजदूरों को उचित मजदूरी का अभाव, और जमीन के अधिकार से वंचित रहना – इन गंभीर मुद्दों ने इस संघर्ष की नींव रखी।
सीमित संसाधनों और बिना किसी बड़े गठबंधन के JMM ने 16 सीटों पर चुनाव लड़कर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। पहली ही कोशिश में 2 सीटों पर दूसरे स्थान पर रहना, 7 सीटों पर 15 हजार से अधिक मत प्राप्त करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी ने जनता के बीच अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी है। यह प्रदर्शन दर्शाता है कि यह केवल शुरुआत है और आने वाले समय में संगठन और भी मजबूत होकर उभरेगा। यह परिणाम एवं लोगों का भरोसा इस बात को और स्पष्ट करती है कि आदिवासी समाज के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाने की आवश्यकता है।
यह केवल एक चुनावी प्रयास नहीं, बल्कि अस्तित्व, पहचान और अधिकारों की लड़ाई है, और आपके साथ, आपके विश्वास के साथ, यह संघर्ष निरंतर जारी रहेगा।
सभी को जोहार।




